वैदिक प्रेरणा

पोस्टर की अधूरी फाइल: आरुष ने अपनी उपलब्धता साफ कही

वैदिक प्रेरणा2026-10-22समय और जीवनदृष्टि • कथा
पोस्टर की अधूरी फाइल: आरुष ने अपनी उपलब्धता साफ कही
रंगमंच समूह की बैठक में आरुष ने फिर एक अतिरिक्त काम के लिए हाथ उठा दिया। इस सप्ताह उसे कार्यालय का जरूरी काम पूरा करना था और शनिवार को घर में पहले से जिम्मेदारी तय थी। फिर भी किसी ने पूछा कि पोस्टर कौन देख लेगा तो उसके मुँह से हाँ निकल गई। बाहर आते समय मित्र निवेदिता ने पूछा कि समय कहाँ से निकालेगा। आरुष ने कहा कि कुछ न कुछ कर लेगा। वह यह वाक्य बहुत बार कहता था। कई बार काम हो भी जाता, लेकिन उसके लिए अपनी तय जरूरतें चुपचाप पीछे करनी पड़ती थीं। इस बार दो दिन बाद आयोजक ने पहला मसौदा माँगा तो आरुष के पास शुरुआत भी नहीं थी। उसे अपना दिया वचन याद था और संकोच हो रहा था। उसने जल्दी में अधूरा मसौदा भेज दिया। उसमें तारीख गलत थी और दो नाम छूट गए थे। आयोजक को वापस सुधार माँगना पड़ा। आरुष परेशान हुआ कि सबके लिए उपलब्ध रहने पर भी लोग संतुष्ट नहीं होते। निवेदिता ने कहा कि शायद समस्या उपलब्ध रहने की इच्छा में नहीं, बिना समय देखे दिए गए आश्वासन में है। सामने वाला उसी आश्वासन पर अपनी योजना बना रहा था। आरुष ने आयोजक को फोन किया। उसने साफ बताया कि वह निर्धारित समय में पूरा पोस्टर नहीं कर पाएगा। उसे यह बात शुरू में ही कहनी चाहिए थी। उसने अब तक की फाइल साझा की और पूछा कि क्या कोई दूसरा व्यक्ति आगे ले सकता है। समूह में व्यवस्था बनी। आरुष ने अपने हिस्से का आवश्यक परिचय देकर काम सौंपा। यह कदम केवल मना कर देने से पूरा नहीं हुआ था। पहले दी गई सहमति के कारण जो निर्भरता बनी थी, उसे बदलने के लिए उचित सूचना और सहयोग भी जरूरी था। अगली बैठक में नया काम आया तो उसने तुरंत हाँ नहीं की। उसने तारीख और अपेक्षित समय पूछा। फिर कहा कि इस सप्ताह नहीं कर सकेगा, अगले महीने सामग्री देखने में मदद कर सकता है। उसे लगा कि लोग नाराज होंगे। कुछ क्षण चुप्पी रही, फिर किसी दूसरे ने जिम्मेदारी ली। बैठक आगे बढ़ गई। आरुष को हैरानी हुई कि उसके मना करने से समूह रुक नहीं गया। वह स्वयं अपने उत्तर को जितना बड़ा निर्णय मान रहा था, कई बार सामने वाला उसे सामान्य उपलब्धता की सूचना की तरह ले सकता था। हर बार उत्तर इतना सहज नहीं मिला। एक परिचित ने कहा कि थोड़ा समय तो निकाल सकता है। आरुष ने लंबी सफाई देने के बजाय अपनी वास्तविक सीमा दोहराई। उसने किसी काल्पनिक बहाने का सहारा नहीं लिया। जहाँ संभव था, उपयोगी विकल्प बताया। जहाँ विकल्प भी नहीं था, वहाँ केवल स्पष्ट उत्तर रखा। उसे दूसरों की हर प्रतिक्रिया नियंत्रित नहीं करनी थी। उसे यह ध्यान रखना था कि अपनी सीमा कहते समय अनावश्यक कठोरता न आए और सहमति देते समय उसकी वास्तविक क्षमता शामिल हो। शनिवार को घर की जिम्मेदारी पूरी करते हुए उसे मंच समूह का संदेश आया। पोस्टर तैयार था और जाँच के लिए भेजा गया था। उसने उपलब्ध थोड़े समय में केवल तारीख और नाम देखे, जैसा तय हुआ था। यह छोटा सहयोग वह ठीक से कर पाया। पहले पूरे काम की जिम्मेदारी लेकर आधा करने के बजाय उसने सीमित हिस्सा साफ समय में दिया था। उसे अपनी उपयोगिता कम नहीं लगी। कुछ भूमिकाएँ छोड़ने से जिन कामों के लिए वह सचमुच मौजूद था, वहाँ अधिक भरोसेमंद उपस्थिति बन सकी। अगले महीने उसने फिर एक कार्यक्रम का काम लिया। इस बार समय था और अपेक्षा स्पष्ट थी। उसने उत्साह से सहमति दी। मना करना सीखने का मतलब हर नए आग्रह से बचना नहीं था। उसे अपनी हाँ का अर्थ मजबूत करना था। शाम को कैलेंडर देखते हुए उसे खाली जगह दिखाई दी। पहले वह उसे तुरंत किसी काम से भर देता। अब उसने कुछ समय खाली रहने दिया, क्योंकि जीवन में अप्रत्याशित बातों और अपनी जरूरतों की भी जगह होती है। उस खाली हिस्से के लिए उसे किसी से प्रमाणपत्र नहीं लेना था। उसे बस अपने दिए हुए उत्तरों के साथ ईमानदार रहना था।

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