बारिश के बाद वाला नक्शा: ऐश्वर्या की प्रदर्शनी का नया रूप

मिट्टी के काम की खुली प्रदर्शनी के लिए ऐश्वर्या ने पूरा आँगन नापकर मेजों की जगह तय की थी। लोग भीतर आएँगे, एक ओर तैयार बर्तन देखेंगे और दूसरी ओर कलाकारों से बात करेंगे। उसने नक्शा बनाकर स्वयंसेवकों को समझाया और सामान की सूची तैयार की। कार्यक्रम से एक दिन पहले तेज बारिश शुरू हो गई। आँगन की व्यवस्था उस रूप में संभव नहीं लग रही थी। ऐश्वर्या बार बार नक्शा देख रही थी, जैसे उसे पर्याप्त ध्यान से देखने पर मौसम उसकी योजना का सम्मान कर लेगा।
साथी अनिरुद्ध ने भीतर वाले कक्ष का सुझाव दिया। ऐश्वर्या को लगा कि इतने छोटे कमरे में पूरा आयोजन बिगड़ जाएगा। उसने कहा कि बाहर के लिए इतनी मेहनत की है। अनिरुद्ध ने माना कि मेहनत सचमुच हुई है, फिर पूछा कि इस आयोजन की सबसे जरूरी बात क्या है। ऐश्वर्या ने कहा कि कलाकार अपना काम दिखा सकें और लोग उनसे बातचीत कर सकें। आँगन सुंदर था, लेकिन उद्देश्य केवल आँगन को सुंदर भर देना नहीं था। यह बात कहते हुए उसे अपनी योजना और आयोजन की जरूरत के बीच का अंतर थोड़ा दिखा।
दोनों ने उपलब्ध कक्ष देखा। सभी मेजें नहीं आ सकती थीं। कुछ प्रदर्शन सामग्री कम करनी पड़ती और लोगों को छोटे समूह में आने का अनुरोध करना पड़ता। रास्ता खुला रखने और वस्तुएँ सुरक्षित रखने की व्यवस्था स्थान के जिम्मेदार व्यक्ति के साथ देखी गई। ऐश्वर्या ने यह नहीं माना कि किसी तरह सब ठूँस देना ही मेहनत बचाना है। उसने कलाकारों से पूछा कि वे कौन से काम प्राथमिकता से दिखाना चाहते हैं। कुछ चयन बदले और एक बड़े काम के लिए अगला अवसर रखने पर सहमति हुई।
कार्यक्रम की सूचना में स्थान और समय का बदलाव साफ लिखना था। ऐश्वर्या को डर था कि लोग संशोधन देखकर उसे अव्यवस्थित समझेंगे। फिर उसने सोचा कि पुरानी सूचना के साथ लोगों को गलत जगह आने देना अधिक परेशानी पैदा करेगा। समूह ने उपलब्ध संपर्कों पर नई जानकारी पहुँचाई और प्रवेश स्थान पर स्पष्ट संकेत रखा। जिनसे सीधे बात हुई, उन्हें बदलाव का कारण संक्षेप में बताया। सब तक सूचना पहुँची है, इसका पूरा दावा नहीं किया गया। इसलिए पुरानी जगह पर भी मार्ग बताने की व्यवस्था रखी गई।
अगली सुबह कुछ लोग पुराने समय पर आए। स्वयंसेवकों ने उन्हें नई व्यवस्था समझाई। कक्ष में भीड़ होने लगी तो समूह ने तय संख्या के अनुसार प्रतीक्षा कराई। ऐश्वर्या को कई बार अपने सुंदर खुले नक्शे की याद आई। फिर उसने देखा कि भीतर दो कलाकार अपने काम पर अच्छी बातचीत कर रहे हैं। छोटे कमरे में कुछ सीमाएँ थीं, लेकिन आयोजन का मुख्य अनुभव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। बदली हुई योजना पहले वाली की असफल प्रतिलिपि भर नहीं थी; वह नई परिस्थिति में काम करने वाला अलग रूप बन रही थी।
कार्यक्रम के बाद समीक्षा में समूह ने केवल प्रशंसा नहीं की। सूचना जल्दी बदलनी चाहिए थी और वैकल्पिक स्थान पहले देख लेना उपयोगी होता। कुछ लोगों का इंतजार अधिक लंबा हुआ था। ऐश्वर्या ने ये बातें नोट कीं। उसने यह कहकर चर्चा बंद नहीं की कि इतनी बारिश में जो किया, बहुत किया। कठिन परिस्थिति मेहनत को समझने में मदद कर सकती थी, लेकिन आगे के सुधार की जरूरत समाप्त नहीं करती थी। साथ ही उसने यह भी स्वीकार किया कि समय पर रूप बदलने से जो संभव हुआ, उसका मूल्य था।
रात को उसने दोनों नक्शे साथ रखे। पहले में खुला आँगन था, दूसरे में छोटे कक्ष की मेजें। उसे लगा कि योजना से प्रेम करना स्वाभाविक है, लेकिन उसके हर हिस्से को उद्देश्य से ऊपर रख देने पर बदलाव अपमान जैसा लगने लगता है। अगली बार वह फिर सोचकर तैयारी करेगी और विकल्प भी देखेगी। मौसम उसके अनुसार न हो तो यह उसकी पूरी क्षमता का निर्णय नहीं होगा। उसे परिस्थिति पढ़कर उचित अगला रूप चुनना होगा। आँगन की बारिश उस दिन रुक नहीं सकी, लेकिन उसके कारण बातचीत और सृजन की पूरी जगह भी बंद नहीं हुई थी।