
जीवन में शांति क्यों नहीं है, जबकि सुविधाएँ पहले से अधिक हैं?
रात के ग्यारह बजे अनिरुद्ध के घर की सारी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं। केवल बैठक में नई खरीदी गई बड़ी स्क्रीन चमक रही थी। उसके सामने बैठा अनिरुद्ध तीसरी बार …
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रात के ग्यारह बजे अनिरुद्ध के घर की सारी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं। केवल बैठक में नई खरीदी गई बड़ी स्क्रीन चमक रही थी। उसके सामने बैठा अनिरुद्ध तीसरी बार …
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प्लेटफॉर्म पर खड़ी सविता ने घड़ी देखी और फिर टिकट। सात बजकर दस मिनट वाली ट्रेन की जगह पटरी खाली थी। आज उसे शहर के विद्यालय में नियुक्ति के लिए साक्षात…
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बंद लिफाफे की रात रात के साढ़े ग्यारह बजे नंदिता तीसरी बार उसी लिफाफे को उठाकर मेज पर रख चुकी थी। उसमें उसके बेटे ईशान के विद्यालय का पत्र था। बाहर के…
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