वैदिक प्रेरणा

अंतिम कुर्सी से देखा मंच: जाह्नवी की सजावट में बची जगह

वैदिक प्रेरणा2026-10-22कला और सृजन • कथा
अंतिम कुर्सी से देखा मंच: जाह्नवी की सजावट में बची जगह
पठन कार्यक्रम का मंच सजाने की जिम्मेदारी मिली तो जाह्नवी ने अपनी पसंद के सभी रंग एक साथ सोच लिए। पीछे बड़ा चित्र, सामने फूल, दोनों ओर चमकती पट्टियाँ और बीच में कार्यक्रम का नाम। कागज पर बनाया नक्शा बहुत सुंदर लग रहा था। उसने समूह को दिखाया तो सबने उत्साह से सहमति दी। अगले दिन कमरे में वास्तविक आकार देखकर पता चला कि पीछे का चित्र इतना बड़ा होगा कि बैठने वाले वक्ता का चेहरा उसकी रेखाओं में खो जाएगा। नाम की पट्टी पर अक्षर भी दूर से स्पष्ट नहीं दिख रहे थे। जाह्नवी को अपना विचार बदलने में दुख हुआ। उसने कई घंटे डिजाइन पर लगाए थे। उसे लगा कि लोग सरल कहकर उसकी मेहनत कम कराना चाहते हैं। कार्यक्रम के संयोजक ने पूछा कि पीछे बैठा श्रोता सबसे पहले क्या देख सके, यह वह चाहती है। जाह्नवी ने कहा कि कार्यक्रम का नाम और बोलने वाले का चेहरा। फिर दोनों कमरे की अंतिम कुर्सी तक गए। वहाँ से उसकी प्रिय छोटी सजावट दिखाई ही नहीं दे रही थी। कुछ बड़ी चीजें दिख रही थीं, लेकिन वे मुख्य बात से ध्यान हटा रही थीं। उसने नक्शे को फिर देखा। नाम के लिए अधिक साफ स्थान रखा, अक्षरों और पृष्ठभूमि का अंतर बढ़ाया और चित्र का आकार घटाया। फूलों को इस तरह रखा कि रास्ता खुला रहे। कमरे की उपलब्ध रोशनी में व्यवस्था जाँचने पर कुछ चमकती सामग्री वापस हटानी पड़ी। नई सजावट में वस्तुएँ कम थीं, फिर भी काम अपने आप कम नहीं हुआ। किस चीज को रखना है और किसे हटाना है, यह निर्णय पहले से अधिक ध्यान माँग रहा था। खाली जगह केवल छूटा हुआ काम नहीं थी; वह जरूरी चीज को देखने की जगह दे रही थी। अभ्यास के दिन एक वक्ता ने पन्ना रखकर पढ़ा। सामने की ऊँची सजावट से उसका कागज और हाथ ठीक से नहीं दिख रहा था। जाह्नवी ने उसे नीचे किया। ध्वनि देखने वाले साथी ने तारों के लिए जगह माँगी। उसने पूरे सजावटी ढाँचे को अंतिम मानकर मना नहीं किया, बल्कि साथ बैठकर स्थान निकाला। मंच लोगों के काम करने की जगह भी था। केवल तस्वीर में सुंदर लगना उसके लिए पर्याप्त नहीं था। उपयोग के छोटे प्रश्न डिजाइन को वास्तविक कमरे में उतार रहे थे। कार्यक्रम की सूचना पट्टी में भी बदलाव हुआ। पहले उसने बहुत सारे वाक्य लिख दिए थे। अब शीर्षक, समय और प्रवेश की जरूरी जानकारी साफ रखी। विस्तृत परिचय अलग स्थान पर उपलब्ध था। किसी ने कहा कि पट्टी खाली लग रही है। जाह्नवी ने उसे दूर से पढ़कर देखने को कहा। उसने तुरंत समय पढ़ लिया। दोनों हँसे। इस छोटी जाँच ने बहस का आधार बदल दिया। पसंद बनी रह सकती थी, लेकिन सूचना अपना काम कर रही है या नहीं, यह देखकर भी निर्णय लिया जा सकता था। कार्यक्रम के दिन कुछ लोगों ने मंच की सादगी की तारीफ की। जाह्नवी को अच्छा लगा, लेकिन उसे पता था कि सादगी अपने आप नहीं आई थी। उसके पीछे हटाई गई वस्तुएँ, बदली हुई ऊँचाइयाँ और कई बार की गई जाँच थीं। फोटो लेने वाले ने पीछे की साफ पृष्ठभूमि की बात की। वक्ता ने कहा कि कागज रखने की जगह सुविधाजनक है। श्रोताओं ने नाम स्पष्ट पढ़ा। सुंदरता अब केवल सजावट की मात्रा से नहीं जुड़ रही थी। वह उपयोग के अनुभव में भी दिखाई दे रही थी। रात में सामान समेटते समय जाह्नवी ने पहला और अंतिम नक्शा साथ रखा। पहले में उसकी कल्पना का उत्साह था, दूसरे में कमरे और लोगों की जरूरतें शामिल थीं। उसने पहला फाड़ा नहीं। वह उसे याद दिलाता था कि विचार शुरू होने और उपयोग तक पहुँचने के बीच बदलते हैं। अगली बार वह फिर सुंदर मंच बनाना चाहेगी। फर्क इतना होगा कि अंतिम कुर्सी पर बैठकर देखना तैयारी के अंत का काम नहीं रहेगा। वह शुरुआत में ही वहाँ जाएगी, ताकि जिस संदेश के लिए मंच बन रहा है, उसे सजावट के बीच अपनी जगह खोजनी न पड़े।

अभ्यास और अन्य विभाग खोलें