मेज पर लौटती स्केचबुक: इरा के दस मिनट के अभ्यास

तीन दिन के उत्साह में इरा ने नए रंग, कागज और ब्रश खरीद लिए थे। उसने तय किया कि रोज एक चित्र बनाएगी। पहले दिन देर रात तक काम हुआ, दूसरे दिन दो छोटे चित्र बने और तीसरे दिन उसने एक लंबी सूची लिखी। चौथे दिन कार्यालय से लौटते समय थकान थी। उसने कहा कि कल कर लेगी। सप्ताह समाप्त हुआ तो सामान मेज पर वैसे ही रखा था। इरा को लगा कि वह शुरू तो बहुत करती है, निभा कुछ नहीं पाती। उसने ब्रश की ओर देखना भी कम कर दिया।
एक रविवार उसकी बड़ी बहन आई। इरा ने कहा कि उसके भीतर कला के लिए जरूरी अनुशासन नहीं है। बहन ने पूछा कि उसने उपलब्ध समय कितना माना था। इरा ने कहा कि एक घंटा रोज। फिर दोनों ने पिछले सप्ताह का सामान्य दिन देखा। घर लौटना, खाना बनाना, जरूरी फोन, आराम और अगले दिन की तैयारी के बीच वह घंटा अक्सर था ही नहीं। उसके संकल्प में जीवन की वास्तविक जगह कम थी। शुरुआत का उत्साह उस कमी को कुछ दिन छिपा सकता था, हर दिन नहीं।
इरा ने नया लक्ष्य लिखा कि सप्ताह में चार शाम दस मिनट कागज पर कुछ देखेगी और बनाएगी। उसे यह इतना छोटा लगा कि बताने में भी संकोच हुआ। पहले वह दस मिनट से अधिक सामान निकालने में लगा देती थी। उसने एक छोटा डिब्बा बनाया, जिसमें पेंसिल, रबर और स्केचबुक साथ रखीं। रंगों वाला लंबा अभ्यास छुट्टी के दिन रखा। अब हर शाम शुरुआत के लिए पूरी मेज बदलना जरूरी नहीं था। काम छोटा करने का अर्थ इच्छा छोटा करना नहीं निकला; उसका प्रवेश थोड़ा सरल हुआ।
पहले सप्ताह उसने कप, चम्मच और खिड़की का कोना बनाया। चित्र अच्छे और खराब दोनों बने। दस मिनट समाप्त होने पर कभी मन हुआ तो थोड़ी देर और रही, कभी बंद कर दिया। उसने हर पन्ने को सार्वजनिक सूची में डालने या रोज की घोषणा करने की शर्त नहीं रखी। उसे अपने अभ्यास से परिचय बनाना था। तीसरे सप्ताह दो दिन छूट गए। पहले वह ऐसी कमी के बाद पूरी योजना छोड़ देती थी। इस बार अगली उपलब्ध शाम किताब खोली और वहीं से शुरू किया। पिछली कमी की भरपाई के लिए खुद को थकाने वाला अतिरिक्त काम नहीं रखा।
महीने के अंत में पन्ने पलटकर उसने कुछ खास अंतर देखे। एक ही कप के अलग चित्रों में हैंडल का आकार धीरे स्पष्ट हुआ था। कुछ पन्ने अब भी जल्दबाजी के थे। उसे यह दावा करने की जरूरत नहीं लगी कि नियमितता से सब अपने आप सुंदर हो गया। लेकिन अब उसके पास अभ्यास का इतना काम था कि अपनी कठिनाइयाँ पहचान सके। उसने कला कक्षा में दो पन्ने दिखाए और आकार देखने के बारे में प्रश्न पूछा। छोटी नियमित कोशिश ने मदद माँगने के लिए स्पष्ट सामग्री दी थी।
कभी कभी छुट्टी के दिन वह लंबा चित्र बनाती। अब उसका आनंद पहले से अलग था। उसे हर बार यह सिद्ध नहीं करना पड़ता था कि वह सचमुच कलाकार बनने योग्य है। कुछ शामों में मन नहीं लगता, कुछ में काम देर से चलता। उसने अपनी दिनचर्या को दंड की तरह कठोर नहीं बनाया। जरूरी पारिवारिक काम या विश्राम के कारण बदलाव होता तो उसे लिखकर नई जगह खोजती। अभ्यास की निरंतरता उसके जीवन के साथ बातचीत कर रही थी, उसके विरुद्ध प्रतियोगिता नहीं।
बरसात की एक शाम बिजली चली गई। इरा ने खिड़की के पास हल्की बची रोशनी में केवल दो रेखाएँ खींचीं और किताब बंद कर दी। उस दिन पूरा चित्र नहीं बना, लेकिन उसे अपने पुराने असफल संकल्प की याद करके शर्म नहीं आई। मेज पर रखी छोटी स्केचबुक अब आरोप लगाने वाली वस्तु नहीं थी। वह लौट सकने की जगह थी। अगली सुबह समय मिला तो उसने उन्हीं रेखाओं को देखा। कला उसके जीवन में अचानक आया बड़ा उत्साह भर नहीं रही थी। वह छोटे, दोहराए गए और कभी रुककर फिर शुरू किए गए समय में धीरे धीरे रहने लगी थी।