वैदिक प्रेरणा

दीवार की तस्वीर में छूटा नाम: अर्पित ने अपने योगदान की बात कही

वैदिक प्रेरणा2026-10-22कला और सृजन • कथा
दीवार की तस्वीर में छूटा नाम: अर्पित ने अपने योगदान की बात कही
विद्यालय की पुरानी दीवार पर बनने वाले सामुदायिक चित्र के लिए कई पूर्व विद्यार्थी रविवार को जुटे थे। सब वयस्क हो चुके थे और अपनी अलग नौकरियों के बीच समय निकालकर आए थे। अर्पित ने रंगों की व्यवस्था की, दीवार की सफाई में मदद की और दो बड़े हिस्सों की पृष्ठभूमि बनाई। शाम को अंतिम तस्वीर के लिए लोग खड़े हुए तो वह ब्रश धोने चला गया। बाद में तस्वीर साझा हुई। नीचे कुछ नाम लिखे थे, उसका नाम नहीं था। अर्पित ने फोन बंद किया और सोचने लगा कि क्या उसका काम इतना भी याद रखने लायक नहीं था। अगले दिन आयोजिका पल्लवी ने बचा सामान लेने को कहा तो उसने संक्षिप्त उत्तर दिया। उसका मन नहीं था कि फिर बिना पहचाने जाने वाला काम करे। फिर उसे अपने ही विचार पर शर्म भी आने लगी। क्या वह केवल नाम के लिए आया था। उसने दोनों भावों को एक दूसरे से लड़ाते हुए पूरा दिन बिताया। मदद करने की खुशी सच थी और अपना योगदान छूट जाने का दुख भी। एक भावना को स्वीकार करने के लिए दूसरी को झूठा कहना जरूरी नहीं था, लेकिन उसे अभी यह बात साफ नहीं दिख रही थी। शाम को उसने पल्लवी से बात की। उसने आरोप लगाने के बजाय बताया कि साझा तस्वीर में नाम न देखकर उसे बुरा लगा। पल्लवी ने सूची देखी और कहा कि कुछ नाम गलती से छूट गए हैं। वह सुधार कर देगी। अर्पित को राहत मिली, साथ ही लगा कि इतनी सी बात वह पहले कह सकता था। उसे चुपचाप दूर हो जाने और अपने दुख को स्वार्थ कहकर दबाने के बीच कोई तीसरा रास्ता मिला था। अपना काम सही पहचाना जाए, यह बात सीधे और सम्मान से रखी जा सकती थी। सूची ठीक हुई तो पल्लवी ने पूछा कि क्या वह दूसरी दीवार के काम में भी आएगा। अर्पित ने कहा कि इस सप्ताह समय कम है। वह केवल सामान की सूची जाँच सकता है। पहले वह शायद अपने महत्व को सिद्ध करने के लिए पूरा दिन दे देता। अब उसने उपलब्ध समय के अनुसार काम लिया। योगदान का सम्मान माँगना और अपनी सीमा समझना साथ चल सकते थे। समूह को भी पता चला कि मदद के लिए हमेशा उपलब्ध दिखाई देने वाला व्यक्ति सचमुच हर समय खाली नहीं होता। कुछ सप्ताह बाद उसी स्थान की एक छोटी रंग पट्टी उतर गई। अर्पित वहाँ से गुजर रहा था। उसने पल्लवी को बताया और अनुमति लेकर अगले दिन उपलब्ध रंग से हिस्सा ठीक किया। इस बार कोई तस्वीर नहीं ली गई, न उसे विशेष उल्लेख की जरूरत लगी। वह काम की सूची में अपना योगदान दर्ज कर सकता था, ताकि आगे की देखभाल का हिसाब रहे। लेकिन हर छोटे काम को लोगों के सामने दिखाना जरूरी नहीं था। पहली घटना में उसे गायब कर दिया गया महसूस हुआ था; यहाँ उसने स्वयं शांत ढंग से एक काम चुना था। दोनों अनुभव अलग थे। दीवार के सामने अगला कार्यक्रम हुआ तो लोग चित्र के साथ तस्वीरें ले रहे थे। अर्पित ने अपने बनाए पृष्ठभूमि वाले हिस्से को देखा। उसमें कोई ऐसा निशान नहीं था, जिससे लोग तुरंत कह दें कि यह उसी का है। फिर भी उसे याद था कि रंग मिलाते समय कौन सी कठिनाई आई और किन मित्रों ने साथ काम किया। पल्लवी ने समूह के पूरे योगदान का परिचय दिया। अर्पित को अच्छा लगा, पर उस दिन की खुशी केवल नाम सुनने पर टिकी नहीं रही। दीवार सचमुच वैसी जगह बन गई थी, जैसी बनाने की उनकी इच्छा थी। घर लौटते हुए उसने समझा कि अपने नाम के बिना काम करना कोई अनिवार्य नैतिक परीक्षा नहीं है। कुछ जगह सही श्रेय जरूरी है और उसका आग्रह किया जा सकता है। कुछ काम शांत संतोष से भी किए जा सकते हैं। उसे दोनों में अंतर पहचानना था, ताकि अनदेखा किए जाने को उदारता का नाम देकर स्वीकार न करे और हर छोटे सहयोग को प्रशंसा की शर्त पर भी न रखे। अगली रविवार की सूची में उसने उतना ही समय लिखा, जितना दे सकता था। उस समय में वह फिर पूरे मन से रंग मिलाएगा।

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