तस्वीर से बाहर सुमेध: दक्ष ने अपनी नाटक मंडली को फिर देखा

नाटक समाप्त हुआ तो मंच पर खड़े कलाकारों के लिए देर तक तालियाँ बजती रहीं। मुख्य भूमिका निभाने वाले दक्ष ने झुककर दर्शकों का अभिवादन किया। सामने पहली पंक्ति में उसकी मित्र अन्विता बैठी थी। उसने पिछले महीने अभ्यास के कुछ दृश्य देखे थे, इसलिए जानती थी कि नाटक तैयार करने में कितनी भागदौड़ हुई है। कार्यक्रम की तस्वीरें खिंचने लगीं तो उसने मंच के कोने से एक व्यक्ति को केबल समेटते देखा। वह पिछले कई सप्ताह अभ्यास में सबसे पहले आने वालों में था, मगर अभी तस्वीर में नहीं था।
उसका नाम सुमेध था। वह रोशनी और मंच सामग्री का काम देखता था। अन्विता ने उससे पूछा कि वह कलाकारों के साथ तस्वीर में क्यों नहीं गया। सुमेध ने कहा कि पहले सामान सुरक्षित रखना है। उसके उत्तर में शिकायत नहीं थी, पर अन्विता को लगा कि पर्दा गिरने के बाद भी कुछ लोगों का काम समाप्त नहीं होता। दर्शक निकल जाते हैं, कलाकार अपने परिचितों से मिलने लगते हैं और मंच के पीछे वही हाथ कुर्सियाँ, कपड़े, तार और डिब्बे सँभालते रहते हैं।
अगले दिन दक्ष ने कार्यक्रम की तस्वीर साझा की। अन्विता ने उसे निजी संदेश में सुमेध की बात बताई। दक्ष ने कहा कि वह सबकी मेहनत का सम्मान करता है। अन्विता ने पूछा कि कार्यक्रम में किन लोगों के नाम बताए गए थे। दक्ष ने सूची देखी तो अभिनय करने वालों के अलावा कुछ नाम छूट गए थे। यह जानबूझकर नहीं हुआ था। लेकिन काम को जरूरी मानना और उसे कार्यक्रम की याद में जगह देना दो अलग बातें थीं। दक्ष ने पहली बार उस अंतर को अपनी तस्वीर के बाहर देखा।
उसने समूह की अगली बैठक में यह बात रखी। कुछ लोगों ने कहा कि मंच पर सभी को बुलाना व्यावहारिक नहीं था। किसी ने सुझाव दिया कि अंतिम अभिवादन से पहले पूरी टीम का परिचय तैयार रखा जाए। सुमेध ने कहा कि उसके लिए केवल नाम पुकारना पर्याप्त नहीं है। अभ्यास का समय बदलता है तो तकनीकी टीम को भी समय से सूचना मिले। अंतिम दिन रोशनी बदलने की माँग अचानक न आए। समूह ने सुना कि सम्मान का एक रूप काम की योजना में भी दिखाई देता है।
अगले आयोजन में दक्ष ने अभ्यास की सूची बनाते समय मंच के पीछे काम करने वालों से अलग से समय पूछा। एक दृश्य में उसे बहुत तेज प्रकाश चाहिए था, पर उपलब्ध व्यवस्था में वह ठीक नहीं बैठ रहा था। पहले वह इसे तकनीकी समस्या कहकर आगे बढ़ जाता। इस बार उसने सुमेध के साथ दृश्य का दूसरा रूप आजमाया। कुछ बदलाव अभिनय में हुए और कुछ रोशनी में। मंच का असर किसी एक विभाग के आदेश से नहीं, बातचीत से बना। दक्ष को अपना काम छोटा नहीं लगा; वह पूरे काम के भीतर अधिक स्पष्ट लगा।
कार्यक्रम के दिन अंतिम परिचय में सभी की भूमिका बताई गई। कुछ लोग मंच पर आए, कुछ अपने काम की जगह से हाथ उठाकर मुसकराए। तस्वीर लेने से पहले सामान समेटने के लिए भी पर्याप्त समय रखा गया। अन्विता ने देखा कि इस बार कुर्सियाँ उठाने में दो प्रमुख कलाकार भी साथ थे। इससे कोई भूमिका मिट नहीं गई थी। केवल यह मान्यता थोड़ी कमजोर हुई थी कि दर्शकों के सामने दिखाई देना ही मेहनत का पूरा प्रमाण है।
रात में दक्ष ने नई तस्वीर साझा की तो उसमें पूरी टीम थी। नीचे उसने सबके काम का सही परिचय लिखा, अपनी उदारता की कहानी नहीं। सुमेध ने अगले दिन रोशनी का छोटा सुधार भेजा और नए नाटक की चर्चा शुरू हुई। अन्विता ने सोचा कि एक अच्छी प्रस्तुति की स्मृति में केवल चमकता हुआ मंच नहीं होना चाहिए। उसके पीछे की समय पर पहुँची सूचना, बार बार की गई जाँच और चुपचाप समेटा गया सामान भी शामिल है। तालियों की आवाज सबके कानों तक पहुँचे, इसके लिए कभी कभी परिचय की सूची और काम बाँटने का ढंग बदलना पड़ता है।