शीशे में किसी और की मुद्रा: अवनि ने अपने भाव का अभ्यास किया

नृत्य कक्ष की दीवार पर लगे बड़े शीशे में अवनि अपनी मुद्रा देख रही थी। अभ्यास का क्रम उसे याद था, लेकिन चेहरे पर हर बार किसी और का भाव आ जाता था। वह जिस नृत्य प्रस्तुति का वीडियो बार बार देखती थी, उसकी कलाकार की भौंहें, मुसकान और हाथों की हलचल अपने अभ्यास में उतारने लगती। शिक्षिका ने कहा कि क्रम ठीक है, अब भाव को अपने भीतर से आने दे। अवनि को यह बात सुंदर लगी, पर उसका अर्थ हाथ में आने वाला कोई स्पष्ट अभ्यास नहीं था।
घर लौटकर उसने फिर वीडियो खोला। दूसरे कलाकार का काम इतना प्रभावशाली था कि अपना प्रयास साधारण लगने लगा। अगले दिन उसने शिक्षिका से पूछा कि अपना भाव खोजने का मतलब क्या हर चीज नई बना देना है। शिक्षिका ने कहा कि सीखे हुए ढाँचे को समझे बिना मनमाना बदलना जरूरी नहीं। पहले प्रसंग को अपने शब्दों में बता। प्रस्तुति में प्रतीक्षा का एक क्षण था। अवनि ने उसे ऐसे सुनाया जैसे कोई दरवाजे पर किसी परिचित के आने की आहट सुन रहा हो, पर अभी निश्चित न हो।
शिक्षिका ने कहा कि अब उसी स्थिति को सामान्य चलने और देखने में दिखाए। अवनि ने पहले शीशे की ओर देखा, फिर दरवाजे की ओर। उसकी गर्दन की हलचल इस बार कुछ अलग थी। वह चेहरे की सुंदर तस्वीर बनाने के बजाय एक आहट सुन रही थी। शिक्षिका ने उसे वहीं रोका और पूछा कि उस क्षण मन में क्या था। अवनि ने कहा कि उत्सुकता भी थी और यह संकोच भी कि कहीं वह गलत न समझ रही हो। दोनों ने उसी छोटे अंतर पर आगे अभ्यास किया।
अगले कुछ दिनों में अवनि ने अपने अभ्यास के छोटे वीडियो बनाए। हर रिकॉर्डिंग देखकर उसने केवल यह नहीं गिना कि हाथ किस ऊँचाई पर था। उसने देखा कि कहाँ भाव जल्दी बदल गया, कहाँ निगाह खाली रही और कहाँ शरीर और प्रसंग साथ आए। तकनीक की गलतियाँ शिक्षिका के साथ सुधरती रहीं। अपने अनुभव से जुड़ने का अर्थ तकनीक छोड़ देना नहीं निकला। इससे उसे तकनीक के भीतर एक कारण मिला, जिसके लिए वह उस दिशा में देखती या उस समय ठहरती थी।
एक शाम सहपाठी ने कहा कि उसका भाव पहले वाले लोकप्रिय वीडियो जैसा नहीं रहा। अवनि पहले घबरा गई, फिर उसने पूछा कि क्या अब प्रसंग समझ आ रहा है। सहपाठी ने कहा कि हाँ, बस उसका ढंग अलग है। इस छोटे उत्तर से अवनि को राहत मिली। अलग होने के लिए अलग दिखने का दबाव भी उतना ही थकाने वाला हो सकता था, जितना किसी की पूरी नकल करना। उसे अभी अपने अभ्यास में अर्थ और स्पष्टता चाहिए थी, किसी विशेष पहचान की जल्दी नहीं।
छोटी प्रस्तुति के दिन उसने वही सीखा हुआ क्रम किया। एक स्थान पर हाथ थोड़ा जल्दी चला गया, लेकिन उसने पूरी प्रस्तुति को उस भूल के हवाले नहीं किया। प्रसंग पर लौट आई। मंच से उतरकर उसने शिक्षिका से पूछा कि क्या प्रतीक्षा वाला हिस्सा स्पष्ट था। शिक्षिका ने दो अच्छी बातें और एक सुधार बताया। अवनि ने पहली बार बिना अपने को पूरी तरह अच्छा या खराब घोषित किए प्रतिक्रिया सुनी। उसे अपने काम के बारे में ठीक ठीक बात करना कुछ आसान लग रहा था।
रात को उसने अभ्यास की पहली रिकॉर्डिंग देखी और फिर नई। अंतर केवल चेहरे की मुद्रा का नहीं था। पहले वह शीशे में किसी दूसरे का प्रभाव खोज रही थी। अब उसे अपने सीखे क्रम में प्रसंग के साथ खड़े होने की जगह मिली थी। उसने वह प्रिय वीडियो अपनी सूची से हटाया नहीं। दूसरे कलाकार से सीखना अभी भी उपयोगी और आनंददायक था। लेकिन अगली बार देखने के बाद वह स्क्रीन बंद करके खुद से भी पूछेगी कि इस क्षण में मैं क्या समझ रही हूँ। नृत्य में उसका अपना स्वर शायद ऐसे ही छोटे प्रश्नों के बीच धीरे धीरे सुनाई देना शुरू हुआ था।