कैनवास पर बचा आकाश: संध्या ने अधूरे चित्र को फिर देखा

संध्या ने कैनवास खिड़की के सामने रखा तो बाहर की रोशनी धीमी हो चुकी थी। रविवार को उसे अपनी पहली छोटी प्रदर्शनी के लिए तीन चित्र चुनने थे। दो तैयार थे, तीसरे में केवल नदी का किनारा और अधूरा आकाश बना था। पिछले चार दिनों से वह इसी चित्र पर लौटती और कुछ देर बाद ब्रश रख देती। उसे लगता कि बाकी सब कलाकार अपना काम बहुत सहजता से पूरा कर लेते होंगे। अपने अधूरे चित्र के सामने बैठकर उसे केवल अपनी कमी दिखाई देती थी।
उसकी मित्र काव्या कमरे में आई तो उसने कैनवास तुरंत दीवार की ओर कर दिया। काव्या ने कारण पूछा। संध्या ने कहा कि अभी दिखाने लायक नहीं है। वह पहले भी कई काम इसी तरह छिपा चुकी थी। कोई रंग ठीक न बैठता तो पूरा काम बेकार लगने लगता। काव्या ने चित्र देखने का आग्रह नहीं किया। उसने अपनी स्केचबुक खोली और कुछ ऐसे पन्ने दिखाए, जिनमें रेखाएँ बीच में छूट गई थीं। संध्या ने पूछा कि इन्हें फाड़ा क्यों नहीं। काव्या बोली कि कुछ पन्ने अभ्यास हैं, कुछ विचार अभी रुके हुए हैं।
यह सुनकर संध्या को राहत भी मिली और खीझ भी। उसे कोई ऐसा उपाय चाहिए था, जिससे तीसरा चित्र उसी रात अच्छा बन जाए। काव्या ने कहा कि पहले यह तय कर ले कि वह चित्र में क्या बचाना चाहती है। संध्या ने कैनवास सीधा किया। नदी का एक छोटा हिस्सा उसे सचमुच पसंद था। पेड़ की परछाईं भारी लग रही थी और आकाश में उसने बहुत कुछ भर दिया था। पूरे चित्र को असफल कह देने से ये अलग बातें दिख ही नहीं रही थीं।
दोनों ने काम को कुछ देर दूर से देखा। काव्या ने अपने अनुसार रंग लगाने की कोशिश नहीं की। उसने केवल पूछा कि दर्शक की नजर पहले कहाँ जाए, यह संध्या चाहती है। संध्या ने नदी के मोड़ की ओर संकेत किया। फिर उसने उसी हिस्से के आसपास के रंगों पर काम करना शुरू किया। उसके ब्रश की गति धीरे थी, पर हर रेखा के बाद अपने पूरे कलाकार होने पर फैसला नहीं लग रहा था। उस शाम वह एक चित्र पर काम कर रही थी, अपनी योग्यता की अंतिम परीक्षा नहीं दे रही थी।
रात को आकाश फिर भी पूरा नहीं हुआ। संध्या ने कैनवास की एक तस्वीर ली और अगले दिन देखने के लिए दो छोटे नोट लिखे। पहले वह देर तक बैठी रहती, जब तक थकान से काम और न बिगड़ जाए। इस बार उसने समय पर सामान साफ किया। अधूरापन कमरे में रह गया, लेकिन वह उसके साथ बिस्तर तक नहीं गया। सुबह लौटकर उसे वही चित्र कुछ अलग दिखा। जो हिस्सा रात में बहुत खराब लग रहा था, उसमें केवल थोड़ी सादगी की जरूरत थी।
प्रदर्शनी के लिए चयन करते समय उसने तीसरा चित्र नहीं भेजा। आयोजक ने दो चित्र स्वीकार कर लिए थे। इस छोटे निर्णय से उसका कलाकार होना समाप्त नहीं हुआ। उसे तय सीमा में तैयार काम देना था, हर शुरू किया हुआ कैनवास उसी अवसर पर दिखाना नहीं। कुछ दिन बाद उसने नदी वाला चित्र फिर खोला। अब उसमें प्रदर्शनी की अंतिम तारीख का दबाव कम था। उसने पेड़ की परछाईं हल्की की और आकाश का बड़ा हिस्सा खाली छोड़ दिया। खाली जगह भी चित्र की भाषा बन सकती थी।
चित्र पूरा हुआ तो संध्या ने उसे काव्या को दिखाया। काव्या ने पूछा कि अब कैसा लग रहा है। संध्या ने कहा कि अच्छा है, और कुछ हिस्से अगली बार अलग बनाएगी। यह उत्तर उसके लिए नया था। पहले अच्छा होने का मतलब कोई कमी न बचना था। अब एक काम पूरा होकर भी अगला अभ्यास सिखा सकता था। उसने कैनवास के पीछे तारीख लिखी और नया कागज निकाला। उस शाम शुरू हुई रेखा को तुरंत सुंदर साबित करने की जल्दी नहीं थी। उसके पास बनाने, रुकने और फिर लौटने की जगह थी।