भूरे जूतों की खुली सिलाई: निखिल ने बदलने से पहले पूछा

अलमारी में रखे भूरे जूते निखिल को अपनी पहली नौकरी की याद दिलाते थे। वे अब रोज इस्तेमाल नहीं होते थे, लेकिन किसी बैठक में वही पहनना उसे सहज लगता था। एक सुबह पीछे की सिलाई खुली दिखी तो उसने उन्हें अलग रख दिया। नए जूते देखने के लिए फोन खोला और कुछ तस्वीरें पसंद कर लीं। तभी पिता ने पूछा कि क्या उसने पुराने की हालत किसी कारीगर को दिखाई है। निखिल ने कहा कि इतने पुराने जूतों में अब क्या ठीक होगा। पिता ने अनुमान के बजाय एक बार पूछ लेने को कहा।
निखिल पैंतीस वर्ष का था और अपने काम में छोटी तकनीकी समस्या आने पर तुरंत जाँच करता था। अपनी वस्तुओं के मामले में वह अक्सर केवल नया और पुराना देखता। पास की मरम्मत की दुकान कई बार नजर आई थी, पर वह भीतर नहीं गया था। उस दिन जूते लेकर पहुँचा तो कारीगर सलीम ने दोनों अलग अलग देखे। उन्होंने केवल खुली सिलाई पर राय नहीं दी। बाकी हालत देखकर बताया कि कौन सा हिस्सा ठीक किया जा सकता है और किस बारे में निश्चित परिणाम का वादा नहीं करेंगे। निखिल को लगा कि उसका पहला प्रश्न जूतों के बारे में कम, मरम्मत को बिना देखे छोटा मान लेने के बारे में अधिक था।
उसने समय और काम का विवरण पूछा। सलीम ने साफ कहा कि शाम तक नहीं हो पाएगा। निखिल की बैठक अगले दिन थी। पहले उसका मन हुआ कि कुछ अतिरिक्त देकर तुरंत करने को कहे। फिर उसने दुकान पर रखे दूसरे लोगों के सामान देखे। अपने काम की जल्दी के कारण सबका क्रम बदलवाना उचित नहीं लगा। उसने बैठक के लिए दूसरा विकल्प चुना और जूते तय समय पर छोड़ दिए। मरम्मत करवाने का निर्णय तभी उपयोगी हो सकता था जब उसे करने वाले व्यक्ति के वास्तविक समय को भी उसमें जगह दी जाए।
दो दिन बाद जूते मिले। वे बिल्कुल नई दुकान वाली तस्वीर जैसे नहीं दिखते थे। पुराने उपयोग के निशान थे और ठीक किया हिस्सा ध्यान से देखने पर पहचान में आता था। निखिल ने पहनकर देखा और अपनी सुविधा के बारे में पूछा। जहाँ कुछ अटका, उसी समय बताया। सलीम ने जरूरी बात समझाई। निखिल ने इसे एहसान की तरह नहीं लिया और न अपनी छोटी मरम्मत को दुनिया बचाने का बड़ा काम बनाया। उसने एक वस्तु की हालत के बारे में सही व्यक्ति से जानकारी ली थी और उपलब्ध विकल्प में उसे फिर उपयोग करना उचित लगा था।
घर पर मित्र ने पूछा कि नया लेना अधिक आसान नहीं होता। निखिल ने कहा कि कुछ स्थितियों में होता होगा। हर खराब वस्तु ठीक करने योग्य नहीं रहती और उपयोग की जरूरत अलग होती है। उसे अपने जूतों की जानकारी लेने के बाद चुनाव मिला था। पहले वह बिना जाँच केवल एक रास्ता देख रहा था। यही फर्क उसके लिए महत्वपूर्ण था। उसने बाकी पुराने सामान को भी बिना सोचे सँभालकर रखने की शपथ नहीं ली। जिन्हें ठीक कराने की संभावना थी, उनकी जाँच हो सकती थी। जिन्हें छोड़ना था, उनके लिए भी जिम्मेदार तरीका जानना था।
कुछ सप्ताह बाद कार्यालय की यात्रा में वही जूते उसके साथ गए। किसी ने उनकी उम्र नहीं पूछी और बैठक में कोई निर्णय जूतों की चमक से नहीं हुआ। निखिल को अपनी पहले की चिंता पर हँसी आई। उसे पुरानी चीज इस्तेमाल करने का संकोच उतना नहीं था जितना यह डर कि वह पर्याप्त नया नहीं दिखेगा। अब भी उसे सुंदर नई वस्तुएँ पसंद थीं। फर्क इतना था कि पसंद का हर संकेत तुरंत खरीद में बदलना जरूरी नहीं लगा। उसके पास रुके हुए प्रश्न के लिए जगह बन गई थी कि क्या मौजूदा चीज अभी उसके काम आ सकती है।
अगली बार वह दुकान गया तो सलीम से सामान्य बातचीत हुई। उसने पहली बार उनके काम का नाम ठीक से याद रखा, केवल मोड़ वाली छोटी दुकान नहीं कहा। घर लौटकर उसने भूरे जूते साफ करके रखे। खुले हिस्से की मरम्मत ने उन्हें अमर वस्तु नहीं बनाया था। आगे उनकी हालत फिर देखनी होगी। फिर भी उस समय वे रोज के उपयोग में लौट आए थे। निखिल के लिए उनकी कहानी केवल बची हुई खरीद की नहीं थी। उसमें एक कौशल का सम्मान, सही जाँच और अपने चुनाव की जल्दी को थोड़ा रोक देने का अनुभव जुड़ गया था।