दरवाजा खुला, लैपटॉप भी: निशांत की घर लौटने वाली शाम

दरवाजा खुला तो निशांत ने कहा कि आज जल्दी घर आ गया है। उसने बैग सोफे के पास रखा, जूते उतारे और लैपटॉप खोल लिया। पत्नी पाखी ने चाय रखते हुए बताया कि छत पर लगाया पौधा फिर फूल देने लगा है। निशांत ने स्क्रीन देखते हुए अच्छा कहा। दस मिनट बाद पाखी बरामदे में अकेली बैठी थी और वह दफ्तर के उसी काम में लगा था जिसे जल्दी निकलते समय पीछे छोड़ देने का दावा किया था। घर पहुँचने का समय बदल गया था, लेकिन शाम का अनुभव लगभग पहले जैसा था।
निशांत को शिकायत सुनकर पहले बुरा लगा। वह सचमुच जल्दी लौटा था और काम भी जरूरी था। उसे लगा कि उसकी कोशिश दिखाई नहीं दे रही। पाखी ने कहा कि उसे हर शाम मनोरंजन या लंबी बातचीत नहीं चाहिए। केवल यह पता रहे कि किस समय वह वास्तव में साथ बैठने के लिए उपलब्ध होगा। अभी वह एक कमरे में होता था, लेकिन हर बातचीत बीच में रुक सकती थी। पाखी को अपने वाक्य की शुरुआत से पहले उसकी स्क्रीन का संकेत देखना पड़ता था। यह अनिश्चितता दोनों को अलग तरह से थका रही थी।
अगले दिन निशांत ने अपने काम का क्रम देखा। कई शामें सच में व्यस्त थीं। कुछ में उसने केवल आदत से संदेश देखते रहना शुरू किया था और फिर एक काम दूसरे को खींच लाया। वह घर में ऐसा समय मानकर आ रहा था जिसमें कार्यालय का अधूरा हिस्सा बिना बताए फैल सकता है। उसने पाखी से कहा कि अगले तीन दिन एक जरूरी काम पूरा करना होगा। उसके बाद छोटा तय समय साथ रखा जा सकता है। यह सुनकर पाखी को कम से कम शाम का आकार समझ आया। अधूरी उपस्थिति के बजाय साफ सूचना मिली थी।
पहले दिन वह तय समय से पंद्रह मिनट देर हुआ। पुराने तरीके से वह बस काम करता रहता। इस बार उसने पहले बता दिया कि और कितना समय लगेगा। पाखी ने अपना काम जारी रखा और उसके इंतजार में चाय ठंडी नहीं होने दी। जब दोनों बैठे तो निशांत ने दिन की कठिन बैठक बतानी शुरू की। पाखी ने कुछ देर सुना, फिर पूछा कि क्या अब उसकी बात सुनने की जगह है। निशांत को एहसास हुआ कि काम से लौटने का अर्थ केवल अपनी पूरी थकान दूसरे के सामने उतार देना भी नहीं है। सामने वाले का दिन भी था।
उन्होंने साथ बैठने को कठोर कार्यक्रम नहीं बनाया। कभी बरामदे में चाय होती, कभी खाना बनाते हुए छोटी बातचीत और कभी चुपचाप पौधों में पानी देना। निशांत को कुछ शाम घर आते ही अकेले शांत बैठने की जरूरत लगती थी। उसने यह कहना शुरू किया, बिना ऐसे गायब हुए कि पाखी कारण अनुमान लगाती रहे। पाखी ने भी अपने पढ़ने या मित्रों से मिलने का समय रखा। दोनों को हर खाली मिनट साथ बिताना आवश्यक नहीं लगा। उन्हें अपने और साझा समय की सीमाएँ थोड़ा साफ जाननी थीं।
एक सप्ताह बाद कार्यालय में नया काम बढ़ गया। निशांत ने सोचा कि अब सारी कोशिश फिर बिगड़ जाएगी। फिर उसने देखा कि कठिन सप्ताह आना उस व्यवस्था की असफलता नहीं है। वह शुरुआत में स्थिति बता सकता था और सामान्य समय लौटने पर बात फिर उठा सकता था। उसने पाखी से केवल समझने की अपेक्षा नहीं की, पूछा कि अगले दिनों की घरेलू जिम्मेदारी कैसे बाँटें। काम का दबाव उसके पास था, लेकिन उसका असर पूरे घर पर पड़ रहा था। इसलिए समाधान भी केवल दूसरे व्यक्ति के धैर्य पर नहीं छोड़ा जा सकता था।
रविवार को पाखी ने उसे उसी पौधे के पास बुलाया जिसका जिक्र पहली शाम अधूरा रह गया था। फूल छोटे थे और कुछ पत्ते सूख गए थे। निशांत ने फोटो लेने के लिए फोन उठाया, फिर पहले उसकी बात सुन ली। पाखी ने बताया कि उसने जगह बदलकर देखा था और अभी तय नहीं था कि उससे कितना फर्क पड़ेगा। बातचीत मामूली थी। फिर भी निशांत को लगा कि ऐसी छोटी बातों को सुनने की जगह खत्म होने पर साथ के बड़े दावे भी खोखले लग सकते हैं। घर की पहचान केवल मुश्किल समय की सहायता से नहीं, रोज की साझी बातों से भी बनती थी।
लैपटॉप अब भी घर आता था और कुछ शामें अब भी देर तक चलती थीं। निशांत ने ऐसा वादा नहीं किया जिसे उसका काम निभाने न दे। उसने केवल अपनी उपलब्धता को साफ और अधिक भरोसेमंद बनाने की कोशिश की। जल्दी लौटने की घोषणा से अधिक उपयोगी वह क्षण निकला जब वह स्क्रीन बंद करके सामने बैठा। पाखी भी उसे समय देखकर रोक सकती थी और अपनी बात रख सकती थी। घर लौटना दूरी तय करने से आगे बढ़ा। उसमें यह छोटा निर्णय जुड़ा कि अब कुछ देर ध्यान भी यहीं रहेगा।