अलमारी हटाने से पहले: कमरे का नक्शा सबने देखा

बैठक की पुरानी अलमारी हटाने के लिए मजदूर बुलाने की तारीख तय हो चुकी थी। अरुण ने पत्नी साक्षी और माँ से कहा कि अगले रविवार कमरा खुला लगेगा। दोनों चुप रहीं। उसे लगा कि प्रस्ताव पसंद आया है। शाम को साक्षी ने पूछा कि अलमारी की किताबें कहाँ जाएँगी। माँ ने पूछा कि उनकी रोज की सिलाई का सामान रखने की जगह क्या होगी। अरुण ने कहा कि बाद में कहीं रख देंगे। उसी उत्तर से बात उलझ गई। जिन लोगों का सामान रोज उस जगह से जुड़ा था, उन्हें निर्णय तैयार होने के बाद सूचना मिली थी।
अरुण ने कमरे का सुंदर चित्र इंटरनेट पर देखा था और सोचा था कि घर में भी वैसी खुली जगह बन सकती है। उसे अलमारी बड़ी और पुरानी लगती थी। साक्षी को भी कमरा थोड़ा हल्का चाहिए था, लेकिन उसके लिए नई व्यवस्था का अर्थ केवल दीवार खाली होना नहीं था। किताबें दूसरे कमरे में पहुँचीं तो रोज का पढ़ना कठिन होगा। माँ की सिलाई की टोकरी नीचे रखी गई तो हर बार झुककर निकालनी पड़ेगी। तीनों एक ही कमरे को देख रहे थे, पर उसके उपयोग के अलग हिस्से उनके ध्यान में थे।
साक्षी ने अगले दिन कागज पर छोटा नक्शा बनाया। अरुण ने पहले इसे अनावश्यक लंबी प्रक्रिया कहा। फिर माँ ने अपनी कुर्सी का स्थान दिखाया और बताया कि दोपहर में रोशनी कहाँ आती है। यह बात अरुण के सुंदर चित्र में नहीं थी। उसने देखा कि खुली दीवार का लाभ उसे अधिक मिल रहा था, जबकि उसकी कीमत दूसरे लोगों के रोज के छोटे कामों में आ सकती थी। वह कमरा बदलना अब भी चाहता था। बस उसे समझ आया कि चाह पूरी करने से पहले दूसरों की जरूरत सुनना समय की बर्बादी नहीं है।
उन्होंने मजदूर को फिलहाल न बुलाने का निर्णय लिया। पहले उपलब्ध सामान से दो अलग व्यवस्थाएँ आजमाई जाएँगी। अलमारी अपनी जगह रही, लेकिन उसकी एक ओर रखी अतिरिक्त मेज हटाई गई। किताबों का एक हिस्सा छाँटा गया और बेकार कागज अलग हुए। माँ की कुर्सी रोशनी के पास रही। इस छोटे बदलाव से कमरा कुछ खुला लगा। अरुण को लगा कि उसके मूल विचार का एक हिस्सा बिना बड़ी तोड़फोड़ के मिल रहा है। फिर भी पूरी समस्या हल नहीं हुई थी। सामान की जगह कम थी और अलमारी का खराब दरवाजा परेशान करता था।
दूसरे रविवार उन्होंने बाकी विकल्प देखे। माँ ने कहा कि छोटी ऊँचाई वाले खाने उनके लिए उपयोगी होंगे। साक्षी ने खुली शेल्फ की सफाई का काम भी चर्चा में रखा। केवल दिखने में हल्की चीज चुनकर उसके रखरखाव का पूरा भार किसी एक व्यक्ति पर नहीं छोड़ा जा सकता था। अरुण ने मरम्मत और नई व्यवस्था के अलग अनुमान जुटाने का काम लिया। उन्हें अपने उपलब्ध साधनों और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच निर्णय करना था। जरूरी खर्च की सीमा घर में पहले से स्पष्ट रखी गई।
जब तीनों की पसंद अलग निकली तो अरुण ने तुरंत बहुमत से निर्णय करने को कहा। फिर देखा कि माँ की सुविधा पर दो लोगों की पसंद भारी पड़ सकती है। उन्होंने हर इच्छा को एक जैसा मत नहीं माना। किस बात से रोज का उपयोग कठिन होगा और किस बात पर केवल रूप की पसंद अलग है, यह अलग किया। माँ ने कमरे के रंग का फैसला दोनों पर छोड़ा। साक्षी ने एक शेल्फ कम रखने पर सहमति दी। अरुण ने अलमारी को पूरी तरह हटाने का आग्रह छोड़ा। बदलाव समझौता था, लेकिन किसी एक की चुप्पी पर खड़ा समझौता नहीं।
मरम्मत के बाद कमरे में नई छोटी व्यवस्था बनी। दीवार का कुछ हिस्सा खाली था और सिलाई का सामान हाथ की पहुँच में था। अरुण को वह पहले देखे चित्र जैसा नहीं लगा। फिर एक शाम उसने माँ को आराम से सामान निकालते और साक्षी को वहीं किताब पढ़ते देखा। वह समझ गया कि कमरे की सुंदरता उसके इस्तेमाल से अलग नहीं थी। मेहमान ने पूछा कि डिजाइन किसने तय किया। इस बार उसने किसी एक का नाम नहीं लिया। उसने बताया कि तीनों ने अलग जरूरतें रखीं और फिर उपलब्ध जगह में रास्ता निकाला।
अगली बार घर में छोटा बदलाव सुझाना था तो अरुण ने तैयार तारीख के साथ सूचना नहीं दी। उसने विचार रखा और पूछा कि उससे किसका कौन सा काम बदलेगा। हर निर्णय के लिए लंबी सभा जरूरी नहीं थी। फिर भी जिन पर असर पड़ना था, उनकी बात पहले आ सकती थी। बैठक में अब कोई औपचारिक नियम नहीं लगा था। केवल एक अनुभव बचा था कि घर की जगह सबकी है तो उसका नक्शा बनाते समय सबके जीवन को भी देखना चाहिए, केवल दीवार और फर्नीचर को नहीं।