कीबोर्ड के पास पिता की कॉपी: शेखर फिर विद्यार्थी बने

कीबोर्ड पर तीसरी बार उँगली गलत जगह गई तो शेखर ने हाथ पीछे कर लिया। बेटी तारा ने कहा कि उसी हिस्से को धीमे करके फिर कोशिश कर सकते हैं। सत्तावन वर्ष के शेखर ने हँसकर कहा कि अब इस उम्र में उनसे क्या सीखा जाएगा। तारा ने उनके सामने रखा छोटा अभ्यास बंद नहीं किया। उसने केवल पूछा कि अगर वह पहली शाम में सीख जाती तो क्या वे इसे इतना छोटा काम मानते। शेखर को जवाब नहीं सूझा। वह संगीत सीखना चाहते थे, मगर विद्यार्थी की तरह बार बार रुकना उन्हें अपने बारे में अच्छा नहीं लग रहा था।
घर में बहुत वर्षों तक शेखर वही व्यक्ति रहे थे जिनसे दूसरे काम समझते थे। औजार कहाँ है, यात्रा की तैयारी कैसे होगी और खराब अलमारी को कौन ठीक करेगा, इन सवालों का उत्तर अक्सर उनके पास होता था। बेटी ने संगीत सीखा तो वे उसकी प्रस्तुति सुनते और तारीफ करते। अब कार्यालय का समय थोड़ा घटा था और उन्होंने पुरानी इच्छा का जिक्र किया था। तारा ने अपना छोटा कीबोर्ड बैठक में रख दिया। इच्छा कहना आसान निकला, लेकिन उसके बाद शुरुआती कठिनाई स्वीकार करना अधिक नया अनुभव था।
अगली शाम शेखर अकेले अभ्यास करने लगे। उन्हें लगा कि जब तक कोई सुन नहीं रहा, गलती कम खटकेगी। मगर जहाँ अटके, आगे का रास्ता याद नहीं आया। तारा आई तो उन्होंने कहा कि अभी बस देख रहे थे। उसने पूछा कि क्या वह सच में मदद चाहते हैं या कुछ देर अपने तरीके से कोशिश करना पसंद करेंगे। इस प्रश्न से उन्हें थोड़ी राहत मिली। मदद लेने का अर्थ यह नहीं था कि अब बेटी हर पल उनके ऊपर शिक्षक बनकर खड़ी रहेगी। वे अपनी जरूरत कह सकते थे और अपने समय से सीख सकते थे।
उन्होंने तय किया कि सप्ताह में दो शाम साथ बैठेंगे। बाकी दिन शेखर छोटा हिस्सा दोहराएँगे। तारा ने बहुत सारी बातें एक साथ बताने की अपनी आदत रोकी। वह जिस चीज को सहज करती थी, उसे शब्दों में समझाना अलग काम था। कभी पिता का प्रश्न उसे सरल लगता और वह जल्दी उत्तर देती। फिर देखती कि प्रश्न खत्म नहीं हुआ। धीरे धीरे उसे भी सीखना पड़ा कि जो बात स्वयं आती है, वह दूसरे के लिए अपने आप स्पष्ट नहीं हो जाती। उनके बीच भूमिकाएँ बदली थीं, पर सम्मान दोनों दिशाओं में रह सकता था।
एक दिन परिवार के मित्र आए। उन्होंने मजाक में कहा कि अब बेटी पिता को डाँटकर पढ़ाएगी। शेखर को बात चुभी। बाद में उन्होंने तारा से कहा कि अभ्यास के समय गलती हो तो उसे घर भर के मनोरंजन की चीज नहीं बनाना चाहते। तारा ने सहमति दी। वह भी अपनी शुरुआती गलतियों पर सामने हँसी सुनकर परेशान होती थी। दोनों ने तय किया कि अभ्यास का चित्र या रिकॉर्डिंग साझा करने से पहले पूछेंगे। सीखते हुए अधूरा दिखने की जगह मिलना उनके लिए लगातार प्रदर्शन करने से अधिक जरूरी था।
महीने के अंत में शेखर ने छोटा टुकड़ा बिना रुके बजाया। कुछ जगह गति असमान थी, लेकिन वह अपना काम सुन पा रहे थे। उन्होंने तुरंत किसी सभा में बजाने की घोषणा नहीं की। अगली बार वही हिस्सा फिर अटका और इस बार उन्होंने उम्र का वाक्य नहीं कहा। उन्हें समझ आ गया था कि एक शाम का ठीक अभ्यास हर अगली कोशिश को पक्का नहीं कर देता। वह समस्या की जगह देख सकते थे और जरूरत पड़ने पर धीमे लौट सकते थे। सीखना उनकी पुरानी समझदारी के खिलाफ फैसला नहीं था।
तारा को एक दिन अपनी नौकरी के काम में पिता की मदद चाहिए हुई। उसे एक छोटी मेज की ऊँचाई बदलनी थी। शेखर ने तरीका बताते हुए देखा कि वह औजार चलाने में उतनी सहज नहीं है। उनका मन हुआ कि खुद पूरा काम कर दें। फिर उन्हें कीबोर्ड वाली शाम याद आई। उन्होंने पहले पूछा कि क्या वह सीखकर करना चाहती है। तारा ने हाँ कहा। इस बार उन्होंने समय दिया और जहाँ जरूरी था, सुरक्षित ढंग से सहारा दिया। एक काम का विद्यार्थी दूसरे काम का जानकार हो सकता था। इससे किसी की पूरी पहचान छोटी नहीं होती थी।
बैठक में कीबोर्ड का स्थान अब स्थायी हो गया था। उसके पास शेखर की छोटी अभ्यास कॉपी रखी रहती। कभी वे सुनते, कभी बजाते और कभी कोई सवाल लिख लेते। उन्हें अब भी गलती पर झुँझलाहट होती थी, पर वह झुँझलाहट हर बार सीखना बंद करने का कारण नहीं बनी। बेटी के साथ बैठने का समय भी बदल गया था। वह केवल पिता की पुरानी सीख सुनने नहीं आती थी; दोनों एक नए काम पर बराबर ध्यान देते थे। शेखर को अपना नया विद्यार्थी होना धीरे धीरे अच्छा लगने लगा था।