दरवाजे के पास रंगों की थैली: मानसी का अपना रविवार

रविवार की सुबह मानसी ने चित्रकला की कक्षा का समय बताया तो घर में सबने कहा कि उसे जरूर जाना चाहिए। फिर उसी बातचीत में पूछा गया कि दोपहर का खाना क्या बनेगा, कपड़े कब धुलेंगे और शाम के मेहमानों के लिए क्या रखना है। पैंतीस वर्ष की मानसी ने कक्षा का संदेश दोबारा देखा। दो घंटे बाहर रहने की सहमति मिल गई थी, लेकिन उन दो घंटों के आगे पीछे घर के सारे काम उसी के नाम खड़े थे। उसने सोचा कि शायद अगले सप्ताह जाना आसान होगा। पिछले तीन रविवार भी उसने यही सोचा था।
मानसी नौकरी करती थी और छुट्टी के दिन घर को ठीक करने की जल्दी रहती थी। परिवार के बाकी लोग भी अपने काम करते थे, पर उसके व्यक्तिगत समय को बचा हुआ समय समझा जाता था। पति अपना खेल पहले से तय करते और बेटी अपनी सहेली के घर जाने का कार्यक्रम बताती। मानसी कहीं जाना चाहे तो पूछती कि उस दिन सबका क्या कार्यक्रम है। किसी ने उसे खुलकर रोका नहीं था। फिर भी उसका अपना समय सबसे आखिर में जगह ढूँढ़ता था। उस रविवार उसने पहली बार इस क्रम के बारे में साफ बात की।
पति रजत ने कहा कि उसने कभी कक्षा जाने से मना नहीं किया। मानसी ने माना कि मना नहीं किया, मगर हर बार खाना पहले बनाकर जाना और लौटते ही बाकी काम उठाना उसके लिए विश्राम नहीं बनता। उसे अपने शौक की सुविधा माँगने से अधिक घर की तैयारी का हिस्सा साझा करना था। दोनों ने उसी दिन की सूची देखी। जरूरी और केवल आदत से जुड़े काम अलग हुए। कुछ काम रजत ने पूरे लिए, कुछ बेटी ने अपनी क्षमता के अनुसार किए और मेहमानों के लिए भारी तैयारी का विचार छोटा कर दिया गया।
कक्षा के पहले दिन मानसी समय से पहले पहुँच गई। वहाँ खाली कागज देखकर उसे कुछ असहज लगा। इतने दिनों तक उसने उपयोगी कामों में समय भरा था कि बिना किसी जरूरी परिणाम के बैठना अजीब लगा। शिक्षक ने सामने रखे पौधे को अपने तरीके से बनाने को कहा। उसकी रेखाएँ कई जगह बिगड़ीं और रंग आपस में मिल गया। उसने चित्र का फोटो घर भेजने का मन बनाया, फिर फोन रख दिया। उसे उस सुबह अपने समय का प्रमाण तुरंत प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं थी। वह केवल सीखने आई थी।
घर लौटने पर रसोई उसकी पसंद के अनुसार नहीं सजी थी। खाना साधारण था और कुछ बर्तन बचे हुए थे। मानसी का पहला मन हुआ कि सब फिर स्वयं ठीक करे। उसने देखा कि आवश्यक काम हो गए हैं और बाकी शाम के तय हिस्से में हो सकते हैं। रजत को भी महसूस हुआ कि खाना बनाना केवल तैयार चीज गरम करना नहीं है। किस समय शुरू करें, क्या उपलब्ध है और सबको कब बुलाएँ, यह उसे खुद तय करना पड़ा था। दोनों ने एक दूसरे के काम पर टिप्पणी करने के बजाय उस दिन की असुविधाएँ बताईं।
अगले रविवार परिवार में अचानक काम आ गया और मानसी कक्षा नहीं जा सकी। इस बार उसका समय हमेशा की तरह गायब नहीं हुआ। उसने शिक्षक से अगली उपलब्ध बैठक पूछी और घर में अपना नया समय बताया। यह भी साफ हुआ कि परिवार की जरूरत आने पर कार्यक्रम बदलना अलग बात है और हर सप्ताह उसका शौक ही सबसे पहले हट जाना अलग। कभी रजत का खेल बदला, कभी बेटी का कार्यक्रम और कभी मानसी का। कोई समय केवल इसलिए कम जरूरी नहीं माना गया कि उसका परिणाम घर के किसी दूसरे व्यक्ति को सीधे दिखाई नहीं देता।
कुछ महीने बाद मानसी ने छोटा चित्र घर की दीवार पर लगाया। वह उसकी सबसे अच्छी बनाई चीज नहीं थी, लेकिन पहली नियमित कक्षा का काम था। बेटी ने पूछा कि क्या अब वह कलाकार बन जाएगी। मानसी ने कहा कि फिलहाल उसे चित्र बनाना पसंद है और वह सीखना चाहती है। हर रुचि को बड़ा पेशा या अतिरिक्त उपलब्धि बनाना जरूरी नहीं था। उसे अपने रविवार के लिए नई पहचान की परीक्षा पास नहीं करनी थी। उस काम का आनंद उसके लिए पर्याप्त कारण था।
घर के रविवार अब भी व्यस्त रहते थे। कभी कोई योजना बिगड़ती और कभी सुबह देर से शुरू होती। फिर भी कैलेंडर में मानसी का समय दूसरों के समय के साथ लिखा था, नीचे बची खाली जगह में नहीं। उसे कहीं जाने से पहले सबके आराम की व्यवस्था अकेले तैयार नहीं करनी पड़ती थी। उसकी पेंटिंग की थैली दरवाजे के पास रखी रहती और उस पर किसी को आश्चर्य नहीं होता। अपने लिए निकले दो घंटे परिवार से दूर जाने की घोषणा नहीं बने। वे घर में उसके पूरे व्यक्ति को स्थान मिलने की एक साधारण शुरुआत थे।