कार्ड खोया नहीं था: नमन ने कबीर की बात दोबारा सुनी

पिता के कमरे में आते ही कबीर ने कहना शुरू किया कि पुस्तकालय का कार्ड उसके पास नहीं है। नमन ने जूते उतारते हुए बीच में पूछा कि फिर कहाँ छोड़ आया। बारह वर्ष का कबीर रुक गया। पिता ने स्कूल का बैग देखने को कहा और याद दिलाया कि चीजें सँभालकर रखनी चाहिए। कबीर बैग खोलने लगा, पर उसका चेहरा बता रहा था कि वह केवल कार्ड की जगह बताने नहीं आया था। नमन थके हुए थे। उन्हें लगा कि एक और खोई वस्तु ढूँढ़ने में शाम निकल जाएगी। उन्होंने बाकी बात सुने बिना खोज शुरू कर दी।
कार्ड अगले ही खाने में मिल गया। नमन ने उसे मेज पर रखा और कहा कि देखा, ठीक से देखते तो मिल जाता। कबीर ने कार्ड उठाया, मगर खुश नहीं लगा। खाने के बाद उसने माँ से पूछा कि क्या कल स्कूल में पुस्तक लौटाने में देर हो सकती है। नमन ने यह सुना तो उन्हें पहले की बातचीत याद आई। उन्होंने कबीर से फिर पूछा कि कार्ड वाली बात में वह क्या बताना चाहता था। इस बार उत्तर आने से पहले उन्होंने कोई अनुमान नहीं जोड़ा।
कबीर ने बताया कि स्कूल से लौटते समय उसका मित्र अपनी पुस्तक उसके बैग में रख गया था। मित्र अगले दिन नहीं आने वाला था। कबीर पुस्तक लौटाना चाहता था, पर उसे नहीं पता था कि दूसरे के नाम की किताब वह जमा कर सकता है या नहीं। कार्ड उसके हाथ में नहीं था, इसलिए उसने बात वहीं से शुरू की थी। वह अपनी चीज खोने की सफाई नहीं दे रहा था। वह एक जिम्मेदारी के बारे में मदद माँग रहा था और उसका शुरुआती वाक्य पूरी बात तक पहुँचने का रास्ता भर था।
नमन को अपनी जल्दी समझ आई। उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले ही मान लिया था कि कार्ड खो गया है। कबीर ने सिर हिलाया और पुस्तक दिखाई। अब भी वास्तविक सवाल का उत्तर नमन को निश्चित नहीं पता था। उन्होंने नियम गढ़ने के बजाय अगले दिन पुस्तकालय में पूछने का तरीका सोचा। कबीर पुस्तक साथ ले जा सकता था और संबंधित व्यक्ति को स्थिति बता सकता था। बात बहुत छोटी थी, मगर उसे समझने के लिए पहले उस जगह तक पहुँचना जरूरी था जहाँ बच्चे का प्रश्न वास्तव में था।
अगले दिन कबीर लौटा तो उसने बताया कि पुस्तक स्वीकार कर ली गई और मित्र के नाम का हिसाब भी देखा गया। नमन ने उसे शाबाशी दी, फिर अपने मन की दूसरी बात पर ध्यान दिया। उन्हें लगा था कि ध्यान से सुनने का अर्थ अधिक समय देना होगा। पिछली शाम अधूरी बात पर बनाई गई पूरी खोज में भी समय गया था। फर्क केवल मिनटों का नहीं था। जब उन्होंने तुरंत दोष मान लिया, तब कबीर को अपनी बात के साथ पिता के अनुमान से भी रास्ता निकालना पड़ा।
नमन ने उसके बाद एक छोटा प्रयास शुरू किया। बच्चा बात शुरू करे तो पहला प्रश्न परिस्थिति समझने का हो, परिणाम सुनाने का नहीं। यह हर दिन आसानी से नहीं हुआ। कभी कबीर इतना घूमकर बताता कि नमन की अधीरता बढ़ती। तब वह कह सकते थे कि पहले बताओ, तुम्हें अभी मुझसे किस बात में मदद चाहिए। कभी वह सचमुच व्यस्त होते और सुनने का समय तय करते। समय कहने के बाद लौटना भी उन्हें याद रखना पड़ता था। केवल बाद में सुनेंगे कह देना और फिर भूल जाना उस कोशिश को भरोसेमंद नहीं बनाता।
कबीर को भी अपनी बात रखने में मदद मिली। उसने एक दिन बताया कि वह शुरुआत में घटना कहेगा, फिर अपना सवाल। नमन ने इसे जरूरी शर्त नहीं बनाया कि जब तक बच्चा पूरा साफ वाक्य न बोले, उसकी बात सुनी ही न जाए। कभी भावनाएँ पहले आती थीं और क्रम बाद में बनता था। दोनों सीख रहे थे। पिता बीच में अनुमान लगाने की अपनी आदत पहचानते और बच्चा पूछ सकता था कि क्या वह अपनी बात पूरी कर ले। यह वाक्य अब घर में बदतमीजी की तरह नहीं लिया जाता था।
महीने भर बाद नमन को अपने काम पर एक सहकर्मी की अधूरी बात सुनते हुए वही पुरानी जल्दी महसूस हुई। उन्होंने प्रश्न पूछा और पाया कि समस्या उस जगह थी ही नहीं जहाँ वह समाधान दे रहे थे। शाम को उन्होंने कबीर को यह घटना बताई। बच्चे ने हँसकर कहा कि कभी कभी बड़े भी बात बीच में रोक देते हैं। नमन ने उसकी बात मानी। मेज पर पड़ा पुस्तकालय का कार्ड उन्हें किसी खोई वस्तु की याद नहीं दिलाता था। वह उस अधूरे वाक्य की याद था जिसे पूरा सुनने पर एक अलग कहानी सामने आई थी।