मेज के किनारे छोटी ट्रे: अनन्या ने साथ बैठने का समय चुना

खाने की मेज पर रोटी आने से पहले तीन बार फोन बज चुका था। अनन्या ने पहली बार काम का संदेश देखा, दूसरी बार अपनी बहन का भेजा चित्र और तीसरी बार बिना किसी जरूरत के स्क्रीन खोल ली। सामने बैठे पति ऋत्विक ने कहा कि आज पड़ोस की पुरानी दुकान बंद हो गई। उसने हाँ कहा, पर थोड़ी देर बाद पूछा कि कौन सी दुकान। ऋत्विक ने बात दोहराई नहीं। वह भी अपना फोन देखने लगे। दोनों साथ बैठे थे और दोनों को लग रहा था कि दूसरा बातचीत में रुचि नहीं ले रहा है।
उस रात कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ। खाना खत्म होने के बाद अनन्या ने बस ध्यान दिया कि उसे भोजन की तीन चीजें याद हैं और बातचीत की एक भी पूरी बात नहीं। अगले दिन उसने ऋत्विक से पूछा कि क्या वे कुछ दिनों तक खाने के समय फोन अलग रख सकते हैं। ऋत्विक ने तुरंत नियम बनाने से मना किया। उनके काम में कभी देर से संदेश आते थे। अनन्या के साथ भी ऐसा होता था। दोनों जानते थे कि जरूरी काम के नाम पर हर बार पूरा फोन खोलने की छूट छोड़ दी तो प्रस्ताव केवल अच्छा वाक्य बनकर रह जाएगा।
उन्होंने पहले यह तय किया कि कौन सी बाधा वास्तव में सामने है। ऋत्विक को कभी अपनी टीम का फोन उठाना पड़ता था। अनन्या की माँ शाम को बात करती थीं। बाकी अधिकतर सूचनाएँ तुरंत देखना जरूरी नहीं थीं। उन्होंने समय बदलने की गुंजाइश देखी और खाने से पहले घर वालों से बात करने लगे। जिस दिन काम की कोई जरूरी बात आने वाली होती, शुरू में बता देते। उस दिन फोन पास रहता, लेकिन स्क्रीन पर आने वाले हर संदेश को जरूरी नहीं मान लिया जाता। वे एक दूसरे की नौकरी का निर्णय नहीं कर रहे थे, अपने साथ बैठने का समय साफ कर रहे थे।
पहले रविवार अनन्या ने मेज के किनारे एक छोटी खाली ट्रे रख दी। फोन उसमें रखने का विचार उसे अच्छा लगा था। ऋत्विक ने मजाक किया कि घर में अब फोन की पार्किंग भी है। दोनों हँसे, पर कुछ ही मिनट में ऋत्विक का हाथ ट्रे तक गया। कोई आवाज नहीं आई थी। उन्होंने खुद यह देखकर हाथ वापस रख लिया। अनन्या भी किसी सवाल का उत्तर ढूँढ़ने के लिए फोन उठाने लगी। फिर दोनों ने तय किया कि जिसका उत्तर भोजन के बाद मिल सकता है, उसके लिए अभी अनुमान लगाना या प्रश्न अधूरा छोड़ देना भी संभव है।
फोन हटते ही हर शाम सुंदर बातचीत से भर गई, ऐसा नहीं हुआ। एक दिन दोनों थके हुए थे और चुपचाप खाए। पहले अनन्या को लगा कि प्रयोग असफल हो रहा है। फिर उसने देखा कि साथ की चुप्पी और किसी स्क्रीन में खोकर अनुपस्थित होने में उसे फर्क महसूस हो रहा था। ऋत्विक ने खाने के बाद अपने दिन की एक कठिन बात कही। उसे लंबी सलाह नहीं चाहिए थी। अनन्या ने पहली बार बीच में आने वाली सूचना देखे बिना पूरा वाक्य सुना। यह छोटी बातचीत किसी पहले से तय विषय से नहीं निकली थी।
जब उनके मित्र भोजन पर आए तो ट्रे मेज पर थी, लेकिन उन्होंने मेहमानों को फोन जमा करने को नहीं कहा। एक मित्र अपने घर से आने वाले जरूरी फोन की प्रतीक्षा कर रही थी। अनन्या ने समझा कि अपने लिए चुनी व्यवस्था को दूसरों के व्यवहार की परीक्षा बना देना ठीक नहीं होगा। उसने केवल अपना फोन अलग रखा। बातचीत चलती रही। कुछ देर बाद एक मित्र ने खुद अपना फोन जेब में रख लिया और दूसरे ने आवश्यक संदेश देखकर वापस रख दिया। उस शाम नियम की घोषणा से अधिक काम मेज पर मौजूद लोगों की सुविधा समझने ने किया।
महीने के अंत में दोनों ने अपने प्रयोग की बात की। कुछ दिनों में खाना देर से हुआ, कुछ दिनों में जरूरी काम बीच में आया और एक दिन वे पुरानी आदत में लौट गए। उन्होंने उसे छिपाने या दूसरे को पकड़ने का खेल नहीं बनाया। अगली शाम फिर ट्रे रख दी। अब सवाल यह नहीं था कि किसने कितनी बार नियम तोड़ा। वे पूछ सकते थे कि आज साथ बैठने के लिए कितना समय सचमुच उपलब्ध है। कभी छोटा समय मिलता, पर वह पहले की लंबी आधी उपस्थिति से उन्हें अधिक अपना लगता।
एक शाम ऋत्विक ने फिर किसी बंद हो रही दुकान का जिक्र किया। अनन्या ने इस बार उसका नाम सुना और याद किया कि वहाँ से वे पहली बार साथ चाय लेकर आए थे। बातचीत वहीं से आगे बढ़ी। मेज पर रखी ट्रे में दोनों फोन थे और कोई असाधारण घटना नहीं हुई थी। बस एक सामान्य बात पूरी सुनी गई थी। अनन्या को लगा कि वह फोन से लड़ाई नहीं लड़ रही थी। उसने अपने घर के एक छोटे समय को पहचान दिया था, जिसमें सामने बैठे व्यक्ति की बात पूरा स्थान पा सकती थी।