छुट्टी माँगने की झिझक: अपने समय की बात साफ कहिए

छुट्टी का आवेदन लिखते समय रेवती ने कारण तीन बार बदला। पहले लिखा कि आवश्यक काम है, फिर पारिवारिक कारण लिखा और अंत में पूरा अनुच्छेद बना दिया। उसकी माँ का जन्मदिन था। कई वर्षों बाद पूरा परिवार एक साथ मिल रहा था। वह एक दिन की छुट्टी चाहती थी, लेकिन उसे डर था कि खुशी के लिए समय माँगना पर्याप्त गंभीर कारण नहीं समझा जाएगा। आवेदन भेजने के बजाय उसने उसे प्रारूप में छोड़ दिया।
रेवती एक पुस्तक वितरक के कार्यालय में काम करती थी। साल के कुछ महीने बहुत व्यस्त रहते थे। इस बार उसका काम समय पर चल रहा था। फिर भी उसे लगा कि अनुमति माँगते ही उसका समर्पण संदेह में आ जाएगा। पिछले महीने एक सहकर्मी की छुट्टी पर किसी ने टिप्पणी की थी कि लोग काम से बचने के बहाने खोजते हैं। टिप्पणी शायद हल्के में की गई थी, पर रेवती ने उसे अपने लिए चेतावनी बना लिया था।
दोपहर को माँ का फोन आया। उन्होंने केवल पूछा कि वह किस गाड़ी से आएगी। रेवती ने कहा कि अभी निश्चित नहीं है। फोन रखने के बाद उसे खीझ हुई। घर में वह अस्पष्ट उत्तर दे रही थी और कार्यालय में अपनी जरूरत बता ही नहीं रही थी। दोनों तरफ चिंता बढ़ रही थी। उसने अपनी मेज पर बचे काम की सूची बनाई। एक आदेश भेजना था, दो बिल जाँचना थे और गोदाम से आने वाली सूची का मिलान करना था।
उसने सहकर्मी फहीम से पूछा कि उसकी अनुपस्थिति में सूची आने पर क्या वह उसे सुरक्षित रख सकेगा। फहीम ने तुरंत हाँ नहीं की। उस दिन उसके अपने काम भी थे। दोनों ने देखा कि सूची अगले दिन मिल सकती है और तत्काल कोई ग्राहक उससे प्रभावित नहीं होगा। इस बातचीत से रेवती को उपयोगी बात समझ आई। जिम्मेदारी निभाने का अर्थ दूसरों से चुपचाप अपना काम करवाना नहीं था। पहले परिस्थिति देखनी और स्पष्ट सहमति लेनी थी।
अगली सुबह वह अपनी प्रबंधक के पास गई। उसने तारीख बताई, छुट्टी माँगी और काम की स्थिति समझाई। कारण पूछने पर उसने कहा कि माँ का जन्मदिन है और परिवार के साथ रहना चाहती है। वह अपनी बात के बाद लंबी सफाई जोड़ने वाली थी, लेकिन रुक गई। प्रबंधक ने कैलेंडर देखा। उसी दिन दो लोग पहले से अनुपस्थित थे। उन्होंने पूछा कि रेवती सुबह का जरूरी बिल पिछले दिन पूरा कर सकती है या नहीं।
बातचीत केवल एक मुस्कराती अनुमति पर खत्म नहीं हुई। तारीख, लंबित काम और संपर्क की अपेक्षा स्पष्ट की गई। रेवती ने कहा कि यात्रा के दौरान लगातार फोन देखना संभव नहीं होगा। जरूरी दस्तावेज कहाँ रहेंगे, यह उसने लिख दिया। छुट्टी की स्वीकृति दर्ज हो गई। लौटते समय उसे लगा जैसे बहुत बड़ा जोखिम लिया हो। वास्तव में उसने अपनी जरूरत और काम के बीच संबंध साफ किया था, जिसे मन में सोचते रहने से कोई और समझ नहीं सकता था।
घर पहुँचकर उसने पहला घंटा फोन हाथ में रखकर बिताया। उसे किसी संदेश की आशंका थी। माँ ने चाय दी और पूछा कि कार्यालय में सब ठीक है न। रेवती ने फोन मेज पर रखा। उसे समझ आया कि छुट्टी स्वीकृत होने के बाद भी मन को अनुपस्थित होने की अनुमति देना अलग अभ्यास है। उसने जरूरी सूचना एक बार देखी और फिर परिवार के साथ बैठ गई। शाम की तस्वीर में वह किनारे से जुड़ी हुई नहीं, पूरी तरह मौजूद थी।
लौटने पर सब कुछ बिल्कुल निर्बाध नहीं मिला। एक बिल पर स्पष्टीकरण चाहिए था। उसने उसे देखा और ठीक किया। इससे छुट्टी गलत निर्णय नहीं बन गई। काम में छोटे सवाल आते रहते हैं। उसने नोट किया कि अगली बार कौन सी जानकारी पहले छोड़ना उपयोगी होगा। फहीम को धन्यवाद दिया और उसके अगले अवकाश की तारीख भी पूछी। आपसी सहयोग की शुरुआत ऐसे ही सामान्य आदान प्रदान से हो सकती थी, एहसान का बोझ बनाए बिना।
रेवती ने उस आवेदन का लंबा प्रारूप मिटा दिया। उसकी जगह कोई बहादुरी भरा नारा नहीं लिखा। बस आगे की छुट्टियों का कैलेंडर समय रहते देखने लगी। हर नौकरी की परिस्थिति और नियम अलग हो सकते हैं; उसकी कहानी कोई सार्वभौमिक अनुमति नहीं थी। लेकिन उसके लिए एक बात बदली थी। जीवन के अपने लोगों के साथ समय बिताने की इच्छा को वह अब शर्म की चीज नहीं मानती थी। उसे व्यवस्थित ढंग से कहना भी जिम्मेदारी का हिस्सा था।