वैदिक प्रेरणा

देर तक बैठना ही काम नहीं: मालिनी की रोशन खिड़की

वैदिक प्रेरणा2026-10-22काम और आत्मसम्मान • कथा
देर तक बैठना ही काम नहीं: मालिनी की रोशन खिड़की
रात के आठ बजे दफ्तर की छठी मंजिल पर केवल तीन खिड़कियाँ रोशन थीं। उनमें से एक के सामने मैं बैठी थी। मेरी रिपोर्ट शाम पाँच बजे पूरी हो चुकी थी। फिर भी कंप्यूटर बंद करने की हिम्मत नहीं हुई। विभाग के नए प्रमुख अभी अपने कमरे में थे। मुझे डर था कि मैं पहले चली गई तो उन्हें लगेगा कि मेरे पास काम कम है या मैं अपनी नौकरी को गंभीरता से नहीं लेती। मेरा नाम मालिनी है। उस समय मुझे कार्यालय में आए छह महीने हुए थे। शुरुआती दिनों में मैंने देर तक रुकने वालों को अधिक प्रशंसा पाते देखा था। किसी ने मुझसे रोज देर तक बैठने को नहीं कहा था, मगर मैंने उस मौन को नियम बना लिया। घर लौटकर थकान होती, अगली सुबह ध्यान बँटता और छोटे काम में भी समय लगने लगता। फिर मैं वही काम पूरा करने के लिए देर तक बैठती। यह चक्र मुझे मेहनती दिखाई देता था। उस शाम सफाई करने आई सरिता ने पूछा कि आज भी खाना यहीं मँगाऊँगी क्या। मुझे अपना कल का डिब्बा याद आया, जो फ्रिज में रह गया था। मैंने कंप्यूटर पर फिर वही रिपोर्ट खोली। तीसरी बार रंग बदले, चौथी बार शीर्षक का आकार बदला। इनमें से कोई परिवर्तन काम को जरूरी रूप से बेहतर नहीं कर रहा था। मैं समय भर रही थी, ताकि उपस्थित होने का प्रमाण बना रहे। यह बात स्वीकार करना मेरे लिए कठिन था। अगली सुबह समीक्षा बैठक में प्रमुख ने रिपोर्ट माँगी। मैंने बताया कि वह तैयार है। उन्होंने पूछा कि कब से तैयार है। मेरे उत्तर के बाद उन्होंने शाम को न भेजने का कारण जानना चाहा। मैंने कुछ देर चुप रहकर अपनी झिझक बता दी। कमरे में असहज मौन हुआ। उन्होंने कहा कि उन्हें कार्यालय में बिताए घंटों से अधिक काम की स्थिति स्पष्ट चाहिए। यह सुनकर मुझे राहत मिली, लेकिन मैं जानती थी कि एक वाक्य से पुरानी आदत तुरंत नहीं बदलेगी। हमने एक छोटी व्यवस्था तय की। मैं दिन की शुरुआत में प्राथमिक काम लिखती और शाम तक उनकी स्थिति भेज देती। जिस काम में अड़चन हो, उसे छिपाने के बजाय समय रहते बताती। जरूरी बदलाव आए तो उसकी समय सीमा पर बात होती। इससे मेरा काम सबको दिखाई देने लगा। साथ ही मुझे भी पता चलता कि मैं कहाँ बिना जरूरत उलझ रही हूँ। सूची केवल अपने पक्ष में सफाई देने का साधन नहीं थी; उससे काम की वास्तविक कठिनाई स्पष्ट होती थी। कुछ दिनों बाद सच में एक तत्काल काम आया। ग्राहक की प्रस्तुति अगले दिन थी और सामग्री अधूरी थी। उस शाम टीम रुकी। फर्क यह था कि रुकने का कारण सब जानते थे, जिम्मेदारियाँ बाँटी गई थीं और अगले दिन के समय पर भी बात हुई। मैं थकी जरूर, पर भीतर छिपा हुआ प्रदर्शन नहीं कर रही थी। उस अनुभव ने समझाया कि कभी आवश्यक अतिरिक्त प्रयास और रोज की अस्पष्ट उपस्थिति एक जैसे नहीं होते। मेरी एक सहकर्मी ने सावधानी से कहा कि हर जगह ऐसी बातचीत आसानी से नहीं होती। वह सही थी। किसी की नौकरी की स्थिति, वरिष्ठों का व्यवहार और जिम्मेदारियाँ अलग हो सकती हैं। मैंने उसे यह सलाह नहीं दी कि बस समय पर निकल जाओ। हमने पहले अपने काम की सूची साफ करने और अपेक्षाएँ पूछने की बात की। बदलाव तभी टिक सकता था जब वह वास्तविक परिस्थिति देखकर किया जाए, किसी सुंदर नारे के भरोसे नहीं। धीरे धीरे शाम के बाद मेरी जिंदगी में छोटी चीजें लौटीं। मैं कभी बाजार से फल लाती, कभी बहन से फोन पर बात करती, कभी केवल चुप बैठती। हर शाम उपयोगी बनाना भी नया लक्ष्य नहीं बनाया। सुबह दफ्तर आती तो कई बार बेहतर ध्यान से काम कर पाती। कुछ दिन फिर अव्यवस्थित होते। लेकिन अब मैं उन्हें अपनी निष्ठा का प्रमाण मानकर सजाती नहीं थी। कारण देखती और जहाँ संभव हो, तरीका बदलती। उस पुराने कमरे की रोशन खिड़की अब भी मुझे याद है। मैं वहाँ काम से अधिक अपने बारे में दूसरों की कल्पना सँभाल रही थी। जिम्मेदार होना जरूरी था, मगर जिम्मेदारी को दिखाई देने के लिए अनंत समय तक कुर्सी से चिपके रहना जरूरी नहीं था। मेरे लिए असली बदलाव जल्दी निकलना नहीं, अपने काम और अपनी सीमाओं के बारे में साफ बोल पाना था। उसी स्पष्टता ने मेहनत को फिर अर्थ दिया।

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