कार्यालय की नई सहकर्मी: अनुमान से आगे बढ़कर स्वागत

नई सहकर्मी के आने से पहले ही कार्यालय में उसके बारे में कई बातें तय कर ली गई थीं। किसी ने सुना था कि वह बड़ी कंपनी में काम कर चुकी है। किसी को लगा कि इतनी अच्छी पोशाक पहनने वाली लड़की शायद छोटे काम नहीं करेगी। मैंने भी उसके परिचय से पहले मन में एक तस्वीर बना ली थी। मेरा नाम सुजाता है। उस सोमवार मुझे अपनी ही तस्वीरों के गलत होने का नया अनुभव मिलने वाला था।
उसका नाम ईशा था। वह समय पर आई, सबका अभिवादन किया और अपनी मेज सँभालने लगी। उसे प्रिंटर का रास्ता नहीं पता था। मैंने उँगली से दिशा बता दी, मगर साथ नहीं गई। मुझे लगा इतनी अनुभवी कर्मचारी को इतना तो समझ आना चाहिए। कुछ देर बाद वह वापस आई। प्रिंटर को जोड़ने के लिए एक स्थानीय तरीका चाहिए था, जिसे हमारे कार्यालय के बाहर कोई जान ही नहीं सकता था। मेरी चुप्पी ने उसकी योग्यता नहीं, मेरी अधीरता दिखाई थी।
दोपहर की बैठक में ईशा ने एक प्रक्रिया बदलने का सुझाव दिया। मेरे भीतर तुरंत विरोध उठा। वह पहले दिन ही हमें काम सिखाने लगी, मैंने सोचा। फिर ध्यान आया कि मैंने स्वयं पिछले महीने उसी प्रक्रिया की शिकायत की थी। फर्क केवल इतना था कि अब समाधान बाहर से आया था। मुझे लगा जैसे पुराने काम पर प्रश्न उठ रहा हो और उसका बचाव करना मेरी जिम्मेदारी हो। यह असुरक्षा मैं उस समय किसी से कह नहीं पाई।
हमारी प्रभारी ने सुझाव तुरंत लागू नहीं किया। उन्होंने ईशा से पुरानी व्यवस्था समझने और हमसे अपनी कठिनाइयाँ लिखने को कहा। अगले दो दिन हम साथ बैठे। ईशा को ग्राहकों की स्थानीय जरूरतें नहीं पता थीं। मुझे कुछ नए उपकरणों का अभ्यास कम था। बातचीत में सामने आया कि हम दोनों कुछ जानते हैं और कुछ सीख रहे हैं। जिस तुलना ने मुझे परेशान किया था, वह असल काम के सामने अधूरी लगने लगी।
तीसरे दिन एक ग्राहक का आवश्यक दस्तावेज नहीं मिल रहा था। ईशा ने पूछा कि पुराने कागज कहाँ रखे हैं। मैंने अलमारी दिखाई और पहली बार उसे वह तरीका समझाया जिससे हमारी छोटी टीम फाइलें पहचानती थी। तरीका सुविधाजनक नहीं था, पर उसके पीछे कुछ पुराने कारण थे। ईशा ने बिना हँसे सुना। फिर उसने पूछा कि क्या हम नया क्रम बनाते समय पुराने संकेत भी साथ रख सकते हैं। मुझे लगा मेरी जानकारी को मिटाया नहीं जा रहा है।
उस शाम चाय पर मैंने प्रिंटर वाली बात का जिक्र किया। कहा कि मुझे पहले ही मदद करनी चाहिए थी। ईशा ने धन्यवाद कहा, फिर बताया कि नए स्थान पर हर छोटी जानकारी पूछना भी थका देता है। हर प्रश्न यह याद दिलाता है कि बाकी लोग अपने घर जैसे सहज हैं और आप अभी बाहर खड़े हैं। मैंने कभी अपने पहले सप्ताह को इस तरह याद नहीं किया था। मुझे भी तब किसी ने पानी की बोतल रखने की जगह तक बताई थी।
हमने मिलकर नए कर्मचारियों के लिए एक साधारण पन्ना तैयार किया। उसमें जरूरी संपर्क, साझा फाइलों का स्थान और सामान्य काम का क्रम था। यह किसी व्यक्ति को परखने की परीक्षा नहीं थी। उससे बेकार की उलझन कम हो सकती थी। प्रभारी ने उसे देखा और कुछ जरूरी सुधार सुझाए। मैं खुश थी कि पहली बार नई सहकर्मी को प्रतिस्पर्धा का खतरा मानने के बजाय उसके साथ एक उपयोगी चीज बना रही थी।
इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे बीच हर बात पर सहमति हो गई। एक सुझाव पर मैंने स्पष्ट विरोध किया। फर्क यह था कि अब कारण काम से जुड़ा था, उसके कपड़ों या पिछले पद से नहीं। ईशा ने अपना पक्ष रखा। हमने एक छोटा परीक्षण करने का निर्णय लिया। परिणाम आने पर कुछ मेरा अंदाजा सही निकला और कुछ उसका। दोनों के पास अपनी बात बदलने की जगह रही। सम्मान का अर्थ मतभेद बंद कर देना नहीं था।
कई सप्ताह बाद एक और नया कर्मचारी आया। ईशा उसे अलमारी दिखा रही थी और मैं प्रिंटर जोड़ रही थी। मुझे उस पहले सोमवार की अपनी दूर खड़ी उँगली याद आई। कार्यालय में किसी का स्वागत केवल नाम पूछ लेने से नहीं होता। उसे काम समझने की जगह देना, अनुमान की जगह बातचीत करना और अपना अनुभव उदारता से बाँटना भी स्वागत है। मुझे अपनी जगह खोने का डर था। सहयोग करने पर पता चला कि जगह थोड़ी और खुल सकती है।