वैदिक प्रेरणा

दूरी में भी भरोसा: खाली कुर्सी का गलत अर्थ

वैदिक प्रेरणा2026-10-22रिश्तों में सम्मान • कथा
दूरी में भी भरोसा: खाली कुर्सी का गलत अर्थ
वीडियो कॉल पर खाली कुर्सी दिखाई दे रही थी। वाणी कुछ क्षण पहले उठकर बाहर गई थी और नमन स्क्रीन के सामने बैठा इंतजार कर रहा था। दोनों अलग शहरों में काम करते थे। रोज रात का समय बातचीत के लिए रखते थे। उस दिन वाणी के पड़ोसी को तत्काल किसी सामान को उठाने में सहायता चाहिए थी। वह लौटकर आई तो नमन का चेहरा बदला हुआ था। उसने पूछा कि अब हमारी बात से अधिक जरूरी हर दूसरी चीज हो गई है क्या। वाणी थक गई थी। उसने कहा कि दो मिनट के लिए उठना किसी संबंध से दूर हो जाना नहीं है। नमन ने फोन समाप्त कर दिया। कुछ देर बाद उसे अपनी तीखी बात पर पछतावा हुआ, लेकिन अकेले कमरे में बैठकर मन फिर शिकायत बनाने लगा। दूरी छोटी घटना को भी बड़ा अर्थ दे रही थी। अगली सुबह उसने संदेश लिखा कि वह बात ठीक से करना चाहता है। वाणी ने शाम का दूसरा समय दिया। इस बार नमन ने पहले अपनी भावना कही। नया शहर उसके लिए कठिन था और रोज की बातचीत दिन का परिचित हिस्सा बन गई थी। जब समय बदलता या बीच में विराम आता तो उसे उपेक्षा महसूस होती। वाणी ने सुना, फिर कहा कि वह उसके अकेलेपन का सम्मान करती है, लेकिन हर क्षण उपलब्ध रहकर उसका पूरा समाधान नहीं बन सकती। वाणी का अपना काम, दोस्त और घर था। नमन के पास भी नए शहर में जीवन बनाने की जरूरत थी। दोनों ने देखा कि उन्होंने रोज का समय तो तय किया, लेकिन उसके अर्थ पर बात नहीं की। कोई दिन लंबा होगा, कोई अचानक काम आएगा और कभी किसी को शांत समय भी चाहिए होगा। इसका अर्थ हर बार संबंध के मूल्य में बदलाव नहीं था। उन्होंने छोटी व्यवस्था बनाई। समय न मिल सके तो जहाँ संभव हो पहले बताएँगे। बात अधूरी रह जाए तो लौटने का अवसर खोजेंगे। लेकिन हर देरी पर तस्वीर, स्थान या किसी और प्रमाण की माँग नहीं होगी। संवाद का उद्देश्य दूसरे की दुनिया जानना था, उस दुनिया पर निगरानी रखना नहीं। नमन को यह बात कहना आसान लगा, निभाना सीखना था। कुछ दिनों बाद वाणी का उत्तर देर से आया। उसके फोन पर काम की चर्चा चल रही थी। नमन ने दो संदेश लिखे, फिर उनमें से एक मिटा दिया। उसे वास्तव में क्या कहना था? उसने केवल पूछा कि आज कब बात सुविधाजनक होगी। फिर वह पास के मैदान में टहलने गया। लौटने पर उत्तर था। उस शाम बातचीत हुई और उसका पूरा समय प्रतीक्षा के अनुमान में नहीं बीता था। नमन ने अपने शहर में पुस्तक मंडली से परिचय किया। वाणी को यह सुनकर खुशी हुई। अब उनकी बातों में केवल एक दूसरे की कमी नहीं, नए अनुभव भी आने लगे। वाणी अपने काम की किसी छोटी सफलता के बारे में बताती और नमन मंडली में पढ़ी कहानी के बारे में। कभी वे एक ही कविता अलग समय पढ़कर बात करते। साझा अनुभव का अर्थ हमेशा एक ही जगह या एक ही मिनट में उपस्थित होना नहीं था। महीने के अंत में मुलाकात हुई। दोनों ने पूरे दिन का कार्यक्रम बहुत भर दिया था। थोड़ी देर बाद थक गए और तय किया कि कुछ योजनाएँ छोड़ देंगे। पास बैठकर चाय पीना भी पर्याप्त था। नमन ने मजाक में कहा कि यहाँ भी बीच में उठकर चली जाओगी? वाणी ने उसकी ओर देखा। वह मुस्कराया और बोला कि इस बार प्रश्न सचमुच मजाक है, हिसाब नहीं। दोनों हँस पड़े। दूरी समाप्त नहीं हुई थी। अगले सप्ताह वे फिर अपने अपने शहर लौट गए। कभी अकेलापन आता और कभी समय की उलझन भी। लेकिन अब भरोसे का अर्थ हर समय उत्तर मिलना नहीं था। उसमें स्पष्ट बात, अपने जीवन की जिम्मेदारी और दूसरे की स्वतंत्रता के लिए जगह थी। खाली कुर्सी वाली शाम उन्हें याद रही, इसलिए नहीं कि कोई साथ छोड़ गया था, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उस खाली जगह में अपने अनुमान रख देने की आदत पहचानी थी।

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