बराबरी की छोटी कुर्सी: सम्मान को जगह भी चाहिए

कार्यशाला की तस्वीर में सब कुछ सुंदर दिखाई दे रहा था। सामने रंगीन कपड़े थे, दीवार पर स्वागत का पोस्टर और बीच में लकड़ी की मेज। हमने शहर की महिलाओं के लिए हाथ की कढ़ाई का एक दिन का परिचय रखा था। इसे सिखाने कमला जी आई थीं, जो वर्षों से यह काम करती थीं। तस्वीर लेने से ठीक पहले उन्होंने पूछा कि उनके बैठने की कुर्सी कहाँ है। मैं एक क्षण को उत्तर नहीं दे पाया।
हमने प्रतिभागियों के लिए कुर्सियाँ लगा दी थीं और कमला जी के लिए मेज के पीछे नीचे गद्दी रखी थी। हमें लगा था कि वह इसी तरह काम करती होंगी। उन्होंने शांत स्वर में कहा कि कुछ काम वह घर में नीचे बैठकर करती हैं, लेकिन आज सबको समझाते समय उन्हें भी मेज की ऊँचाई पर बैठना है। किसी ने उनसे पूछा ही नहीं था। उनकी सुविधा के बारे में हमारी कल्पना तैयारी बनकर सामने रख दी गई थी।
मैंने तुरंत कुर्सी मँगाई। मुझे लगा कि अब बात ठीक हो गई। लेकिन कमला जी ने कहा कि केवल कुर्सी रखने से काम नहीं बनेगा। कपड़े की दिशा, रोशनी और लोगों के देखने की जगह भी बदलनी होगी। उन्होंने हमें मेज थोड़ा घुमाने को कहा। दो कुर्सियाँ सामने से हटाकर दोनों किनारों पर लगाईं। अब प्रतिभागी उनके हाथ देख सकते थे और वह हर व्यक्ति की कोशिश भी देख सकती थीं।
पहले दस मिनट में मुझे समझ आने लगा कि हमने उन्हें मुख्य शिक्षिका कहा जरूर था, पर व्यवस्था अपने हिसाब से बनाई थी। कार्यक्रम के परिचय में उनका नाम छोटा था और संस्था का नाम बहुत बड़ा। प्रश्न पूछने के लिए लोग हमारी ओर देख रहे थे, जबकि उत्तर उनके पास था। मैंने परिचय फिर स्पष्ट किया कि आज हम सब उनके अनुभव से सीखने आए हैं। फिर कुर्सी खींचकर प्रतिभागियों के साथ बैठ गया।
कमला जी ने पहला टाँका दिखाया। उन्होंने केवल हाथ की गति नहीं बताई। कपड़ा ज्यादा कसने से रूप कैसे बदलता है और जल्दी करने पर धागा क्यों उलझता है, यह भी समझाया। एक प्रतिभागी ने उनके काम को आसान कह दिया। कमला जी ने उसे एक छोटी आकृति पूरी करने को दी। कुछ कोशिशों के बाद वह महिला हँसी और बोली कि देखने में सरल लगना और करने में सरल होना अलग है। कमरे की हँसी किसी पर नहीं, सीखने की अपनी अधीरता पर थी।
विराम के समय मैंने कमला जी से पूछा कि कार्यक्रम की तैयारी में और क्या छूटा। उन्होंने कहा कि आने जाने का समय और सामग्री पहले स्पष्ट होती तो वह अलग नमूने ला सकती थीं। उन्हें शुरुआत में केवल इतना बताया गया था कि थोड़ा सा काम दिखाना है। मैंने अपना संदेश याद किया। हमने उनके अनुभव की जरूरत तो रखी, लेकिन उस अनुभव को कार्यक्रम में ढालने की मेहनत का अनुमान कम लगाया था।
अगले हिस्से में प्रतिभागियों ने अपनी बनाई छोटी आकृतियाँ सामने रखीं। कमला जी हर काम में एक उपयोगी बात बतातीं और एक अगला सुधार। किसी को केवल अच्छा कहकर आगे नहीं बढ़ जातीं। उन्हें हमारी तैयार की सजावट से अधिक इस बात में रुचि थी कि लोग वास्तव में कुछ सीखकर जाएँ। मुझे लगा कि शिक्षक की प्रतिष्ठा मंच की ऊँचाई से नहीं बनती, लेकिन मंच की व्यवस्था उसे अनदेखा भी नहीं करनी चाहिए।
कार्यक्रम समाप्त होने पर तस्वीर फिर ली गई। इस बार कमला जी बीच में बैठी थीं और हम सब अपनी अधूरी कोशिशें दिखा रहे थे। तस्वीर पहले से कम व्यवस्थित लग सकती थी। कुछ धागे मेज पर थे और कोई काम पूरी तरह सुंदर नहीं था। लेकिन वह दिन वास्तव में जैसा था, उसके अधिक निकट थी। उन्होंने खुद अपनी पसंद की तस्वीर चुनी और अपना नाम सही लिखवाया।
अगली कार्यशाला से पहले मैंने अतिथि शिक्षिका से व्यवस्था पर बात की। यह पूछना औपचारिक सम्मान की पंक्ति से अधिक उपयोगी निकला कि किस ऊँचाई की मेज चाहिए, सामग्री कैसे रखें और परिचय में कौन सी जानकारी दी जाए। हर व्यक्ति की जरूरत एक जैसी नहीं थी। अनुमान की जगह प्रश्न आने से तैयारी भी बेहतर होने लगी।
पहली तस्वीर अब भी मेरे पास है। उसमें नीचे रखी छोटी गद्दी को देखकर मुझे अपनी कमी याद आती है, लेकिन केवल शर्म नहीं। वह एक स्पष्ट सीख की पहचान है। किसी को सम्मान से बुलाना शुरुआत है। उसे अपनी सुविधा बताने, अपने काम का तरीका तय करने और अपनी विशेषज्ञता के साथ सामने बैठने की वास्तविक जगह देना आगे का काम है। कभी बराबरी की बात किसी बड़े भाषण से नहीं, एक ठीक जगह रखी कुर्सी से दिखाई देने लगती है।