तस्वीर में मुस्कान, घर में मौन: जो बात तस्वीर नहीं कहती

शादी की वर्षगाँठ पर खींची तस्वीर में अन्वी और साहिल बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। शाम की हल्की रोशनी थी और दोनों किसी पुरानी बात पर सचमुच हँस पड़े थे। तस्वीर साझा हुई तो मित्रों ने सुंदर जोड़ी लिखा। अन्वी ने उत्तर दिए और फोन रख दिया। घर लौटते समय दोनों के बीच फिर वही चुप्पी थी जो पिछले कई दिनों से छोटी छोटी बातों के पीछे जमा हो रही थी।
तस्वीर झूठी नहीं थी। उस क्षण दोनों खुश थे। कठिनाई यह थी कि वह क्षण उनके संबंध का पूरा विवरण नहीं था। साहिल नए काम के कारण देर से लौटता था। अन्वी की समय सीमा भी बढ़ गई थी। घर के काम किसी साफ व्यवस्था के बजाय जिस व्यक्ति को पहले दिख जाते, उसी पर आ जाते। अक्सर वह अन्वी होती थी। दोनों थके थे और दोनों को लगता था कि दूसरा उनकी थकान नहीं देखता।
सुबह साहिल ने तस्वीर देखकर कहा कि शाम अच्छी बीती। अन्वी ने सहमति दी, फिर बोली कि उन्हें कुछ जरूरी बात भी करनी है। साहिल को लगा कि वह सुंदर शाम में भी कमी खोज रही है। उसने पूछा कि क्या कभी सब ठीक नहीं रह सकता। अन्वी चुप हो गई। उसे लगा कि यदि कोई समस्या बताएगी तो उसके हिस्से में हमेशा खुशियाँ बिगाड़ने वाला व्यक्ति होना आएगा।
दिनभर दोनों ने सामान्य संदेश भेजे। सामान लेना है, बिल देख लेना, कब लौटोगे। बातचीत चलती रही, लेकिन अनुभव साझा नहीं हुआ। रात को अन्वी ने तय किया कि वह एक ही बार में पिछली सभी शिकायतें नहीं खोलेगी। उसने कहा कि अगले सप्ताह के घर के काम पर आधा घंटा साथ बैठना है। साहिल ने पहले कहा कि अभी बहुत देर हो गई है। फिर दोनों ने अगले दिन का समय तय किया।
मेज पर बैठकर अन्वी ने बताया कि उसे केवल कुछ काम करने से परेशानी नहीं है। हर समय यह याद रखने की जिम्मेदारी भी उसी पर आ जाती है कि क्या खत्म हुआ, कौन सा काम कब करना है और किस बात की सूचना किसे देनी है। साहिल ने अपनी काम की थकान बताई। इस बार अन्वी ने उसे बीच में यह कहकर नहीं रोका कि वह भी थकी है। दोनों अनुभव एक दूसरे को गलत सिद्ध करने के लिए जरूरी नहीं थे।
उन्होंने काम लिखे। कुछ छोटे दिखने वाले कामों में बहुत से चरण थे। सामान लाना केवल बाजार जाना नहीं था, जरूरत देखना और सूची बनाना भी था। घर में किसी को बुलाना केवल दरवाजा खोलना नहीं था, समय तय करना और मौजूद रहना भी था। सूची देखकर साहिल ने कहा कि उसने कई कामों का केवल अंतिम हिस्सा देखा था।
अगले सप्ताह जिम्मेदारियाँ बदलीं। पहली कोशिश में कुछ चीजें छूटीं। साहिल हर बात पूछता तो अन्वी को लगता कि व्यवस्था फिर उसी को चलानी पड़ रही है। उन्होंने इस पर अलग बात की। किसी काम की जिम्मेदारी लेने का अर्थ उसके पूरे क्रम को समझना था। अन्वी को भी दूसरे व्यक्ति को अपने तरीके से करने की जगह देना सीखना था, जहाँ कोई आवश्यक बात प्रभावित न हो।
यह सब एक बातचीत से पूरा नहीं हुआ। कुछ शाम फिर चुप्पी आई और कुछ बात गलत ढंग से कही गई। फर्क यह था कि समस्या का नाम सामने था। दोनों उसे केवल प्यार की कमी या दूसरे व्यक्ति के स्वभाव की खराबी नहीं मान रहे थे। जहाँ व्यवस्था बदलनी थी, वहाँ बदलाव की कोशिश थी। जहाँ भावना आहत हुई थी, वहाँ उसे सुनना था।
एक मित्र ने उनकी तस्वीर साझा करके वैसा ही संबंध चाहने की बात लिखी। अन्वी ने कोई सार्वजनिक व्याख्यान नहीं दिया। वह अपने घर की निजी बात हर व्यक्ति को बताने के लिए बाध्य नहीं थी। लेकिन उसने खुद भी तस्वीर को अपने संबंध की सफलता का प्रमाण नहीं बनाया। खुशी का एक दृश्य याद रखना अच्छा था, उससे कठिन बातचीत की आवश्यकता गायब नहीं होती।
कुछ महीने बाद दोनों फिर उसी जगह गए। तस्वीर इस बार कम अच्छी आई। हवा में बाल चेहरे पर थे और साहिल की आँखें आधी बंद थीं। अन्वी ने उसे हटाने के बजाय अपने पास रख लिया। उस शाम दोनों ने खाना खाते समय अगले सप्ताह के काम के साथ एक पुरानी मजेदार याद भी साझा की। सामान्य बातचीत का लौटना किसी आकर्षक तस्वीर से कम सुखद नहीं था।
घर लौटते समय साहिल ने पूछा कि यह तस्वीर डालेंगी? अन्वी ने कहा कि बाद में देखेंगे। अभी वह उसे एक कहानी सुनाना चाहती है। कार में बातचीत शुरू हुई। उनके बीच कोई आदर्श जीवन स्थापित नहीं हुआ था। बस अब सुंदर दिखने के साथ भीतर की बात रखने की जगह भी बन रही थी। मुस्कान अपनी जगह रही, और उसके पीछे मौन को अकेले सब सँभालने के लिए नहीं छोड़ा गया।