किसी का समय अपना न मानें: बस पाँच मिनट का काम

रात को ग्यारह बजे रोहित के फोन पर संदेश आया कि सुबह तक एक छोटा पोस्टर बना देना। संदेश चचेरे भाई का था। परिवार के समारोह के लिए निमंत्रण चाहिए था। रोहित ने उत्तर दिया कि अगले दिन उसका अपना काम जमा होना है। भाई ने हँसते हुए लिखा कि तुम्हारे लिए तो पाँच मिनट की बात है। रोहित स्क्रीन देखता रह गया। यह पाँच मिनट वाला वाक्य उसने कई बार सुना था।
वह चित्रांकन और डिजाइन का काम करता था। परिवार में पहली बार किसी ने उसे कंप्यूटर पर काम करते देखा तो सबको अच्छा लगा। धीरे धीरे हर समारोह, दुकान की सूचना और परिचित के कार्यक्रम का छोटा काम उसके पास आने लगा। उसे सहायता करना पसंद था। कठिनाई सहायता से नहीं, इस अपेक्षा से थी कि उसका समय पहले से उपलब्ध माना जाता था।
किसी को अंतिम आकार का छोटा चित्र दिखाई देता। उसके पीछे सामग्री पढ़ना, नाम ठीक करना, अलग आकार बनाना और कई बार संशोधन करना नहीं दिखता। रोहित जब समय माँगता तो लगता कि वह साधारण काम को बड़ा बना रहा है। उसने भी कई बार अपनी असुविधा छिपाकर रात में काम पूरा किया था। इससे दूसरे लोगों को उसकी वास्तविक उपलब्धता का पता कैसे चलता? अब उसे यह बात समझ में आने लगी थी।
अगली सुबह उसने भाई को फोन किया। उसने समारोह की खुशी में शामिल होने की बात पहले कही, फिर बताया कि आज काम लेना संभव नहीं है। यदि अगले सप्ताह समय दिया जाए तो वह एक सरल निमंत्रण बना सकता है। भाई नाराज हुआ कि अब तो कार्यक्रम नजदीक है। रोहित ने उसकी परेशानी सुनी, लेकिन अपना तय काम छोड़ने का वादा नहीं किया। उसने उपलब्ध विकल्प खोजने में मदद की।
दिनभर रोहित के मन में अपराधबोध रहा। उसे लग रहा था कि शायद वह अपने लोगों से दूर हो रहा है। शाम को उसकी बहन ने कहा कि सहायता का अर्थ हर बार अपनी योजना तोड़ना नहीं है। उसने पूछा कि रोहित किसी कारीगर से रात को यह कहेगा कि सुबह तक बस थोड़ा काम कर देना? रोहित ने मना किया। फिर अपने श्रम को हल्का बताने की आदत पर उसे भी विचार करना पड़ा।
कुछ दिनों बाद परिवार की बैठक हुई। रोहित ने शिकायतों की लंबी सूची नहीं पढ़ी। उसने एक सामान्य बात रखी। किसी काम के लिए पहले सामग्री और समय बता दें, फिर वह अपनी उपलब्धता साफ कह सकेगा। अगर काम उसकी पेशेवर सेवा का हिस्सा है तो उसके बारे में भी पहले बात होगी। कभी वह उपहार के रूप में मदद करेगा, लेकिन यह चुनाव उसका होगा, चुपचाप तय अपेक्षा नहीं।
सबको यह बात तुरंत पसंद नहीं आई। एक बुजुर्ग ने कहा कि पहले लोग बिना हिसाब मदद करते थे। रोहित ने बताया कि वह आगे भी करेगा। अंतर केवल इतना है कि मदद माँगते समय दूसरे व्यक्ति के पास हाँ या ना कहने की वास्तविक जगह हो। यदि मना करते ही संबंध पर प्रश्न उठने लगे, तो अनुरोध आदेश जैसा हो जाता है। बात धीरे कही गई, इसलिए लोग सुन सके।
भाई ने बाद में उसे समारोह की तस्वीरें भेजीं। निमंत्रण किसी और से बन गया था। उसने माना कि काम इतना छोटा नहीं निकला जितना सोचा था। कई नामों में संशोधन हुआ और अलग प्रति भी चाहिए थी। रोहित ने उसका मजाक नहीं बनाया। उसने कहा कि इसी कारण वह पहले समय समझना चाहता है। बातचीत में पिछली नाराजगी कुछ हल्की हुई।
रोहित ने अपनी ओर भी बदलाव किया। जिस दिन मदद का वादा करता, उसे अपने काम की सूची में वास्तविक स्थान देता। केवल लोगों को प्रसन्न करने के लिए हाँ कहकर बाद में देर नहीं करता। यदि कोई सीमा हो तो पहले बताता। उसे समझ आया कि अपना समय सम्मान से रखने के साथ दूसरे के कार्यक्रम को भी स्पष्ट उत्तर देना जरूरी है।
अगले समारोह का संदेश इस बार दस दिन पहले आया। सामग्री पूरी थी और पूछा गया था कि क्या उसके पास समय है। रोहित ने देखा और हाँ कहा। उसने निमंत्रण खुशी से बनाया। काम के बीच न रात की हड़बड़ी थी, न उपेक्षा का मन। जब कोई उसके श्रम को पहचानता है तो वही सहायता बोझ की जगह अपनापन महसूस होती है।
समारोह में भाई ने कहा कि इस बार पोस्टर बहुत अच्छा बना। रोहित ने मुस्कराकर धन्यवाद दिया। उसे केवल चित्र की प्रशंसा अच्छी नहीं लगी थी। उससे पहले पूछा गया प्रश्न भी याद था कि क्या तुम्हारे पास समय है। उस छोटे प्रश्न ने संबंध में कोई दूरी नहीं बनाई थी। उसने एक व्यक्ति के दिन, श्रम और निर्णय को भी बाकी तैयारियों की तरह वास्तविक माना था।