वैदिक प्रेरणा

स्क्रीन से बाहर का रविवार: छत पर उगा एक साझा काम

वैदिक प्रेरणा2026-10-22डिजिटल जीवन और विवेक • कथा
स्क्रीन से बाहर का रविवार: छत पर उगा एक साझा काम
रविवार की सुबह अनिरुद्ध ने परिवार से घोषणा की कि आज कोई फोन नहीं छुएगा। उसे लग रहा था कि घर में सब अपनी अपनी स्क्रीन में उलझे रहते हैं। उसने नाश्ते की मेज पर एक टोकरी रख दी। पत्नी माही ने पूछा कि क्या यह निर्णय सबने मिलकर लिया है। अनिरुद्ध ने कहा कि इसमें पूछने की क्या बात है, पूरा दिन साथ बिताना ही तो है। बारह वर्ष के बेटे विहान ने याद दिलाया कि उसे दोपहर में अपने मित्र के साथ विज्ञान प्रकल्प की बात करनी है। अनिरुद्ध ने इसे बहाना समझा। माही की माँ का फोन आने वाला था। उन्हें घर की पुरानी अलमारी के नाप के बारे में मदद चाहिए थी। माही ने कहा कि फोन एक ही तरह का काम नहीं करता। उसे हटाने से साथ होना अपने आप शुरू नहीं हो जाता। अनिरुद्ध चुप हो गया। उसने पिछले रविवार की अपनी तस्वीर याद की। वह खुद फोन पर काम का संदेश पढ़ रहा था और बेटे से बाहर खेलने को कह रहा था। उसे अचानक लगा कि वह आज अपनी बेचैनी का नियम सब पर लागू कर रहा है। उसने टोकरी मेज से हटाई और पूछा कि हम ऐसा क्या करना चाहेंगे जिसमें सचमुच एक दूसरे के साथ हों। विहान ने छत पर पड़े पुराने गमले दिखाए। कई महीनों से वे खाली थे। माही ने कहा कि उनके लिए मिट्टी लानी होगी और नीचे की नाली के पास जमा सूखे पत्ते भी हटाने होंगे। अनिरुद्ध ने पहले बाजार जाने की बात सोची, फिर पड़ोसी से पता चला कि उनके पास कुछ अतिरिक्त मिट्टी है। दो छोटे पौधे भी मिल सकते हैं। रविवार का कार्यक्रम किसी ऐप में खोजने से पहले घर में ही मिलने लगा था। तीनों ने काम बाँटा। विहान पुराने गमले साफ करने लगा और माही टूटे किनारे वाले बर्तन अलग करने लगी। अनिरुद्ध नीचे से मिट्टी लाया। थोड़ी देर में हाथ मैले हो गए और छत पर पानी फैल गया। कोई काम ठीक से नहीं कर रहा, यह कहने का मन कई बार हुआ। फिर माही ने हँसते हुए कहा कि यह प्रतियोगिता नहीं, हमारा पहला छोटा बगीचा है। एक पौधे का नाम किसी को ठीक से नहीं पता था। विहान ने फोन उठाया। अनिरुद्ध कुछ कहने वाला था, फिर रुक गया। उन्होंने पौधा देने वाले पड़ोसी से बात की। उन्होंने नाम बताया और अपनी देखभाल का अनुभव साझा किया। विहान ने वही बात एक कागज पर लिखी। फोन इस्तेमाल हुआ, लेकिन कुछ मिनट बाद फिर मेज पर रख दिया गया। वह काम का साधन रहा, पूरा कार्यक्रम नहीं बना। दोपहर में विहान ने मित्र से प्रकल्प पर बात की। माही ने अपनी माँ को अलमारी के नाप समझाए। अनिरुद्ध ने भी एक जरूरी संदेश का उत्तर दिया। इसके बाद तीनों फिर छत पर लौटे। किसी ने यह हिसाब नहीं रखा कि किसने कितने मिनट स्क्रीन देखी। वे देख रहे थे कि सुबह से तय किया काम आगे बढ़ रहा है या नहीं और उसके बीच सबकी जरूरतों की जगह बनी हुई है या नहीं। शाम तक गमले पंक्ति में लग गए। कुछ मिट्टी गलत जगह बिखरी थी और एक पौधा थोड़ा टेढ़ा था। विहान ने उसे सीधा करना चाहा, लेकिन जड़ को बार बार छूने के बजाय पड़ोसी से सहायता ली। माही ने पानी का छोटा डिब्बा रख दिया। अगला प्रश्न था कि कल से देखभाल कौन करेगा। रविवार की सुंदर तस्वीर के बाद सोमवार की जिम्मेदारी भी थी। उन्होंने सप्ताह की छोटी सूची बनाई। किसी का काम छूट जाए तो दूसरे को याद दिलाना था, अपमान नहीं करना। अनिरुद्ध को यह बात विशेष रूप से अपने लिए लगी। वह अक्सर अच्छे विचार को आदेश की तरह प्रस्तुत कर देता था। आज जब उसने पूछना शुरू किया, तो परिवार के पास भी करने के लिए अपने विचार निकले। रात को छत की तस्वीर लेने का मन हुआ। विहान ने कहा कि पहले तीनों साथ बैठकर थोड़ी देर देख लें। नीचे सड़क की आवाज आ रही थी और ऊपर छोटे गमलों की कतार थी। कोई असाधारण यात्रा नहीं हुई थी। फिर भी दिन अलग लगा, क्योंकि उसमें केवल एक ही घर में रहना नहीं, एक साथ कुछ करना शामिल था। अगले रविवार के लिए फोन बंद करने की घोषणा नहीं हुई। माही ने पूछा कि किताबों की पुरानी अलमारी साथ मिलकर देखेंगे? विहान ने कहा कि हाँ, लेकिन दोपहर का अपना समय रखेगा। अनिरुद्ध ने सहमति दी। उसे अब लग रहा था कि स्क्रीन से बाहर का जीवन किसी दंड से नहीं खुलता। कभी वह एक साझा सवाल से शुरू होता है कि आज हम सचमुच साथ क्या करना चाहेंगे।

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