वैदिक प्रेरणा

बुजुर्ग का पहला वीडियो कॉल: सीखने में जल्दी किस बात की

वैदिक प्रेरणा2026-10-22डिजिटल जीवन और विवेक • कथा
बुजुर्ग का पहला वीडियो कॉल: सीखने में जल्दी किस बात की
दीनानाथ ने फोन को कान से हटाकर सामने किया तो स्क्रीन पर केवल छत का पंखा दिखाई दिया। दूसरी ओर उनकी पोती हँस रही थी। उन्होंने झेंपते हुए फोन वापस कान पर लगा लिया। पोती दूसरे शहर में पढ़ने गई थी और चाहती थी कि रविवार को वीडियो पर बात हो। दीनानाथ के लिए फोन का मतलब आवाज सुनना था। उसमें अपना चेहरा कहाँ रखना है, यह नया प्रश्न था। घर में सबने कभी न कभी उन्हें समझाने की कोशिश की थी। बेटा जल्दी में दो बटन दिखाकर कहता कि बस इतना ही तो करना है। बहू एक बार सिखाती और फिर रसोई में चली जाती। दीनानाथ सिर हिलाते, लेकिन अगली बार वही स्क्रीन सामने आते ही क्रम भूल जाते। उन्हें लगता कि गलती करने पर कुछ खराब हो जाएगा। पूछने से अधिक कठिन था बार बार वही बात पूछना। एक दिन पड़ोस की वयस्क युवती दीपा पुस्तक लौटाने आई। उसने उन्हें फोन में कुछ खोजते देखा। दीनानाथ ने कहा कि उनकी उम्र में ये चीजें समझ में नहीं आतीं। दीपा ने फोन अपने हाथ में लेने के बजाय पूछा कि वह क्या करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि पोती का चेहरा देखना है, लेकिन बिना किसी को परेशान किए। दीपा ने कुर्सी खींच ली। उसने सबसे पहले उनसे फोन की पकड़ आरामदायक करने को कहा। फिर पूछा कि जिन लोगों से वह रोज बात करते हैं, उनके नाम कहाँ ढूँढ़ते हैं। दीनानाथ ने संपर्क सूची खोल दी। यह काम उन्हें आता था। दीपा ने वहीं से आगे की बात जोड़ी। उसने एक साथ बहुत सारे विकल्प नहीं बताए। पहले केवल सामने दिखाई देने वाला कैमरे का चिह्न पहचाना और उसके बाद अगला कदम देखा। पहली कोशिश में उन्होंने गलत चिह्न छू दिया। स्क्रीन बदल गई और उनके चेहरे पर घबराहट आ गई। दीपा ने कहा कि वापस चलेंगे और फिर कोशिश करेंगे। उसने यह नहीं कहा कि अभी तो बताया था। दीनानाथ ने खुद वापस जाकर पोती का नाम चुना। इस बार वह धीरे चले, लेकिन हर कदम उन्हें समझ में आ रहा था। पोती ने कॉल उठाया तो उसका चेहरा बहुत पास था। दीनानाथ ने तुरंत कहा कि अब तुम्हारा केवल माथा दिख रहा है। दोनों हँस पड़े। दीपा ने पीछे हटकर उन्हें खुद बात करने दी। थोड़ी देर बाद पोती ने अपना कमरा दिखाया। मेज पर किताबें थीं और खिड़की के पास वही छोटा गमला था जो दीनानाथ ने विदा करते समय दिया था। उन्हें लगा कि दूरी के बीच कोई परिचित चीज अचानक पास आ गई है। कॉल समाप्त होने के बाद दीपा ने पूछा कि वह अगली बार का क्रम लिखना चाहेंगे या खुद करके दोहराना। दीनानाथ ने दोनों चुने। एक कागज पर अपने शब्दों में लिखा, पोती का नाम खोलो, कैमरे वाला चिह्न देखो, फोन सामने रखो। किसी तकनीकी शब्द का पूरा अर्थ याद करना जरूरी नहीं था। उन्हें वही काम समझना था जिसके लिए फोन उठाते थे। अगले रविवार बेटा सहायता करने आया तो दीनानाथ ने कहा कि पहले वह खुद कोशिश करेंगे। एक जगह रुके और कागज देखा। फिर कॉल लग गया। बेटा आश्चर्य से देखता रहा। उसे समझ आया कि पिता को केवल आसान बटन नहीं, बिना जल्दबाजी के अभ्यास का अवसर चाहिए था। उसने उस दिन पहली बार फोन छीनकर जल्दी काम पूरा नहीं किया। कुछ दिनों बाद दीनानाथ को अनजान व्यक्ति का वीडियो कॉल आया। उन्होंने उसे उठाना जरूरी नहीं समझा। जिस काम को सीख लिया था, उसका अर्थ हर नए संपर्क पर भरोसा करना नहीं था। उन्होंने परिचित से पूछा और बात आगे नहीं बढ़ाई। दीपा ने उनकी इस सावधानी की तारीफ की। नया कौशल और अपनी समझ साथ चल सकते थे। अब जब पोती कोई चित्र दिखाती तो दीनानाथ केवल देखते नहीं, प्रश्न भी पूछते। वह अपने घर की तुलसी, नई खरीदी पुस्तक और कभी कभी पुरानी तस्वीर भी दिखाते। एक बार कैमरा उलटी ओर हो गया तो उन्होंने खुद ठीक कर लिया। गलती अब अपमान जैसी नहीं लगती थी। वह बातचीत का छोटा हिस्सा बन गई थी। पुस्तकालय में उनके मित्र ने कहा कि उसे भी यह काम सीखना है। दीनानाथ ने तुरंत फोन नहीं लिया। उन्होंने कुर्सी खींचकर पूछा कि सबसे पहले तुम क्या करना चाहते हो। दीपा का यही प्रश्न उन्हें याद था। उस दिन उन्होंने केवल वीडियो कॉल का तरीका आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने सीखने की वह शांति भी आगे दी जिसमें किसी व्यक्ति की गति का सम्मान किया जाता है और छोटी सफलता उसके अपने हाथों से पूरी होती है।

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