वैदिक प्रेरणा

बच्चे की तस्वीर किसकी जिम्मेदारी: तृषा की बात भी सुनिए

वैदिक प्रेरणा2026-10-22डिजिटल जीवन और विवेक • कथा
बच्चे की तस्वीर किसकी जिम्मेदारी: तृषा की बात भी सुनिए
विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में नौ वर्ष की तृषा ने पहली बार मंच पर कविता सुनाई। उसकी माँ अवनि दर्शकों में बैठी थी। कविता की तीसरी पंक्ति पर तृषा थोड़ी रुकी, फिर अपनी शिक्षिका की ओर देखकर आगे बोलने लगी। कार्यक्रम समाप्त होने पर अवनि ने उसे गले लगाया। तृषा की खुशी केवल तालियों की नहीं थी। उसे लग रहा था कि उसने अपने डर के बावजूद काम पूरा किया है। अगली सुबह परिवार के समूह में तृषा का वीडियो घूम रहा था। किसी ने उसके रुकने वाले हिस्से को अलग करके मजेदार संगीत जोड़ दिया था। कई लोगों ने हँसने वाले चिह्न लगाए। उन्हें लगा कि यह प्यारी सी शरारत है। अवनि ने जब वीडियो दिखाया तो तृषा मुस्कराई नहीं। उसने पूछा कि सब पूरा कविता पाठ क्यों नहीं देख रहे, केवल वही जगह क्यों दिखा रहे हैं जहाँ वह भूल गई थी। अवनि के पास तुरंत कोई अच्छा उत्तर नहीं था। वीडियो उसने ही सबसे पहले परिवार में भेजा था। उसने सोचा था कि करीबी लोग बच्ची की उपलब्धि देखकर खुश होंगे। लेकिन तस्वीर या वीडियो आगे पहुँचने के बाद उससे क्या बनाया जाएगा, इस पर उसने विचार नहीं किया था। उसने तृषा से कहा कि वह बात समझ गई है और इसे ठीक करने की कोशिश करेगी। तृषा ने स्पष्ट कहा कि उसे वह छोटा वीडियो पसंद नहीं है। अवनि ने यह कहकर उसकी बात हल्की नहीं की कि इतनी सी बात पर नाराज नहीं होते। उसने पूछा कि क्या वह पूरा वीडियो भी हटाना चाहती है। तृषा कुछ देर सोचती रही। उसे अपनी नानी को कविता दिखानी थी, लेकिन बहुत से अनजान लोगों के पास वह नहीं जाना चाहती थी। उसका उत्तर बड़ा नहीं था, पर अपनी सुविधा के बारे में साफ था। अवनि ने पहले उस रिश्तेदार से निजी बात की जिसने नया वीडियो बनाया था। वह दुखी हो गए और बोले कि उनका इरादा तो प्यार जताने का था। अवनि ने उनके इरादे पर आरोप नहीं लगाया। उसने बताया कि तृषा को कैसा लग रहा है और उनसे वह वीडियो हटाकर आगे भेजने वालों को भी रोकने का अनुरोध किया। रिश्तेदार ने बात सुनी और संशोधित वीडियो हटा दिया। फिर अवनि ने परिवार के समूह में छोटी सूचना लिखी। बच्चों की तस्वीर या वीडियो का मजाकिया रूप बनाकर आगे भेजने से पहले उनके अभिभावक से पूछें और बच्चे की असुविधा भी सुनें। उसने किसी का नाम नहीं लिखा। वह समूह को झगड़े में नहीं बदलना चाहती थी। कुछ लोगों को यह अनावश्यक सावधानी लगी, लेकिन कई ने कहा कि उन्होंने इस बात को पहले ऐसे नहीं सोचा था। विद्यालय में भी कार्यक्रम की तस्वीरों के बारे में चर्चा हुई। शिक्षिका पहले से अभिभावकों की पसंद जानना चाहती थीं, पर व्यवस्था साफ नहीं थी। उन्होंने अगली गतिविधि से पहले बताया कि कौन सी तस्वीर विद्यालय की सूचना में लग सकती है और कौन सी केवल निजी प्रति रहेगी। जिन बच्चों के चित्र साझा नहीं किए जाने थे, उनकी भागीदारी या मंच पर आने के अवसर कम नहीं किए गए। तृषा को इस बातचीत की सारी बातें नहीं समझनी थीं। उसे इतना जानना जरूरी था कि उसका असहज होना सुना जा रहा है। अवनि ने उसे फोन की स्क्रीन पर दिखाया कि तस्वीर भेजने से पहले किन बातों पर ध्यान देती है। नाम, विद्यालय का चिन्ह और पृष्ठभूमि में दिखाई दे रही निजी जानकारी कभी अनजाने में भी शामिल हो सकती है। उसने डराने के बजाय सावधानी को सामान्य आदत की तरह समझाया। कुछ दिनों बाद तृषा ने घर में कविता फिर सुनाई। इस बार वह बीच में रुकी तो खुद हँस पड़ी। अंतर यह था कि हँसी उसके साथ थी और परिस्थिति उसकी अपनी थी। नानी ने फोन पर पूरा पाठ सुना। उन्होंने कहा कि पहली बार की कोशिश सुनना भी अच्छा लगा था और यह नई कोशिश भी। किसी ने दोनों को प्रतियोगिता नहीं बनाया। अवनि को लगा कि बच्चे की खुशी साझा करने की अपनी इच्छा और बच्चे की अपनी इच्छा हमेशा एक जैसी नहीं होंगी। हर उपलब्धि को सार्वजनिक बनाना जरूरी नहीं। कभी एक तस्वीर परिवार के छोटे दायरे में रह सकती है और कभी बच्चा खुद उसे चुनकर दिखा सकता है। इस चुनाव में बड़े की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, लेकिन बच्चे की आवाज भी गायब नहीं होनी चाहिए। अगले कार्यक्रम में अवनि ने वीडियो बनाया। मंच से उतरकर तृषा ने उसे देखा और कहा कि नानी को भेज दो। अवनि ने पूछा कि परिवार के बड़े समूह में? तृषा ने थोड़ी देर बाद सिर हिलाकर मना कर दिया। अवनि ने फोन रख दिया। उस दिन उसने केवल कविता का अच्छा पाठ नहीं सुना था; उसने अपनी बच्ची को अपनी बात कहने का थोड़ा अधिक भरोसा भी दिया था।

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