एक तस्वीर के लिए ठहरना: दुनिया को बिना फ्रेम के देखिए

रीमा ने नदी किनारे पहुँचते ही कैमरा निकाल लिया। सुबह की धूप पानी पर टूट रही थी और पुराने घाट की सीढ़ियाँ हल्की सुनहरी दिखाई दे रही थीं। वह सप्ताहांत में अपने लिए समय निकालकर आई थी। पिछले कई दिनों से उसे लग रहा था कि काम और घर के बीच उसकी दृष्टि केवल जरूरी चीजें खोजती रहती है। आज वह कुछ सुंदर देखना चाहती थी।
उसने दूर खड़ी नाव की तस्वीर ली, फिर पेड़ की डाल की और फिर सीढ़ियों पर पड़े पीले पत्तों की। हर तस्वीर के बाद स्क्रीन देखती। कोई फ्रेम उसे पूरा नहीं लग रहा था। कभी पीछे बिजली का तार आ जाता, कभी किसी व्यक्ति का कंधा और कभी पानी का रंग वैसा नहीं दिखता जैसा आँखों से दिख रहा था। पंद्रह मिनट में उसका उत्साह झुँझलाहट में बदल गया।
पास बैठा एक वृद्ध व्यक्ति चाय पी रहा था। उसके पास कोई बड़ा कैमरा नहीं था, केवल छोटी नोटबुक थी। वह कभी सामने देखता और कभी कुछ लिखता। रीमा ने पूछा कि क्या वह चित्र बनाता है। उसने पन्ना दिखाया। उसमें नाव का साधारण रेखांकन था और नीचे लिखा था कि बँधी हुई नाव भी पानी के साथ लगातार थोड़ा हिलती रहती है।
रीमा ने पानी की ओर फिर देखा। नाव सचमुच बहुत हल्के से आगे पीछे जा रही थी। उसकी तस्वीर में वह स्थिर वस्तु बन गई थी। आदमी ने कहा कि वह रोज कुछ देर यहाँ बैठता है और एक ऐसी बात लिखता है जिसे पहले ध्यान से नहीं देखा हो। किसी दिन कुछ खास नहीं मिलता तो वह वही लिख देता है। उसके लिए लौटने से पहले उपलब्धि दिखाना जरूरी नहीं था।
रीमा ने कैमरा कुछ देर गोद में रख लिया। घाट पर झाड़ू लगाने वाली महिला सूखे पत्तों को एक जगह कर रही थी। हर बार हवा कुछ पत्ते वापस बिखेर देती। वह उन्हें उठाकर अलग ढंग से समेटती और फिर आगे बढ़ जाती। इस छोटे काम में धैर्य था, लय थी और रोज की मेहनत थी। रीमा ने महसूस किया कि वह अभी तक केवल सुंदर वस्तुएँ खोज रही थी, सुंदर ढंग से होने वाले काम नहीं।
उसने महिला से बातचीत की। वह पास की बस्ती में रहती थी और सुबह जल्दी काम समाप्त करके घर लौटती थी। रीमा ने उसे कैमरे में कैद करने की जल्दी नहीं की। पहले कुछ देर उसके काम को देखा और फिर पूछा कि क्या तस्वीर ले सकती है। महिला ने कहा कि चेहरा शामिल न करना। रीमा ने ऐसा ही फ्रेम चुना जिसमें झाड़ू, पत्ते और सीढ़ियों पर गिरती रोशनी थी।
तस्वीर देखते समय उसे पहली बार केवल रंग अच्छे नहीं लगे। अब उसे उस फ्रेम के पीछे का काम भी याद था। तस्वीर में महिला का नाम या जीवन की पूरी कहानी नहीं थी। वह उसका अनुमान लगाकर कोई नाटकीय विवरण नहीं लिखना चाहती थी। जितना देखा था, उतना ही कहना पर्याप्त था। बाकी अनुभव उसका अपना था और सामने वाले व्यक्ति का जीवन उससे कहीं बड़ा।
थोड़ी देर बाद धूप बदल गई। घाट का एक हिस्सा उजला था और एक हिस्सा छाया में। रीमा उसी जगह बैठी रही जहाँ पहले खड़ी होकर जल्दी जल्दी तस्वीरें ले रही थी। अब उसे लगा कि एक ही स्थान लगातार नया हो सकता है। इसके लिए दूर जाना हमेशा जरूरी नहीं, अपनी देखने की गति बदलना भी जरूरी हो सकता है।
वापस लौटते समय वृद्ध व्यक्ति ने पूछा कि अच्छी तस्वीर मिली? रीमा ने कहा कि कुछ तस्वीरें मिली हैं, लेकिन उससे अधिक एक अच्छी सुबह मिली है। उसने कैमरे की स्क्रीन दिखाने के बजाय पानी की ओर इशारा किया। नाव की रस्सी किनारे के पत्थर से हल्के से रगड़ खा रही थी। अब वह उस छोटी गति को भी देख पा रही थी।
घर पहुँचकर उसने सभी तस्वीरें तुरंत साझा नहीं कीं। कुछ चुनकर अलग रखीं और एक नोट में लिखा कि अगली बार कैमरा खोलने से पहले पाँच मिनट केवल देखना है। यह कोई परीक्षा का नियम नहीं था। किसी दिन समय कम होगा और किसी दिन दृश्य जल्दी बदल जाएगा। फिर भी वह अपने अनुभव को हर बार स्क्रीन की जाँच में खो देना नहीं चाहती थी।
अगले रविवार वह घर की खिड़की के पास बैठी। सामने छत पर कपड़े सूख रहे थे और हवा में एक सफेद दुपट्टा बार बार मुड़ रहा था। वह कहीं यात्रा पर नहीं गई थी, फिर भी दृश्य नया लगा। कैमरा पास था। उसने उसे उठाया, फिर एक पल रुक गई। कभी तस्वीर बनाने से पहले दुनिया को थोड़ी देर बिना फ्रेम के देख लेना भी कला सीखने की शुरुआत होता है।