लाइक से बाहर की दोस्ती: एक छोटे लिफाफे का साथ

उदय ने पुराने मित्रों के समूह में अपनी दुकान की नई तस्वीर डाली। शटर पर ताजा रंग था और भीतर लकड़ी की अलमारियाँ चमक रही थीं। कई लोगों ने बधाई दी। नीरजा का कोई उत्तर नहीं आया। उदय ने उसका नाम देखा और फोन रख दिया। पिछले महीने उसने उसकी यात्रा की हर तस्वीर पर कुछ लिखा था। उसे लगा कि उसकी अपनी खुशी में नीरजा की कोई रुचि नहीं रही।
दोनों कॉलेज में साथ पढ़े थे। नीरजा दूसरे शहर में पुस्तक संपादन का काम करती थी और उदय ने हाल में स्टेशनरी की दुकान खोली थी। समय के साथ उनकी बातचीत कम हुई थी, लेकिन स्क्रीन पर परिचय बना रहता था। उदय को उसकी पसंद के कैफे और पहाड़ों की तस्वीरें याद थीं। उसे यह नहीं पता था कि पिछले कुछ सप्ताह उसका साधारण दिन कैसा गुजर रहा है।
दुकान के उद्घाटन से एक दिन पहले नीरजा का फोन आया। उदय ने काम में व्यस्त होने के कारण नहीं उठाया। रात को उसने छोटा संदेश लिखा कि बहुत काम है, बाद में बात करेंगे। नीरजा ने ठीक है लिखा और बात वहीं रुक गई। उदय ने इसे उसकी औपचारिकता समझा। उसे याद नहीं आया कि फोन पहले उसी ने किया था।
उद्घाटन के दिन काउंटर पर एक साधारण लिफाफा मिला। भीतर कुछ सुंदर बुकमार्क थे और एक पन्ने पर बच्चों के लिए छोटी पढ़ने की सूची। नीरजा ने लिखा था कि दुकान में यदि एक कोना किताबों की खोज के लिए रखो तो इनका उपयोग कर सकते हो। अंत में उसने अपनी छोटी लिखावट में बधाई दी थी। कहीं कोई तस्वीर या सार्वजनिक घोषणा नहीं थी।
उदय ने तुरंत फोन मिलाया। नीरजा ने बताया कि उसने नया फोन लिया है और बहुत से समूह मूक रखे हैं। संपादन की अंतिम समय सीमा के बीच वह हर सूचना नहीं देख पा रही थी। उदय ने पूछा कि तब बुकमार्क बनाने का समय कैसे मिला। नीरजा हँसी और बोली कि रोज दस मिनट करती रही। उसे पता था कि उदय इस दुकान के लिए कितने दिनों से मेहनत कर रहा है।
उदय कुछ देर चुप रहा। उसने स्वीकार किया कि उत्तर न आने से वह नाराज था। नीरजा ने उसकी भावना का मजाक नहीं उड़ाया। उसने कहा कि उसकी अपनी शिकायत भी है। कई महीनों से दोनों एक दूसरे की तस्वीरें तो देख लेते हैं, लेकिन ठीक से बात नहीं करते। तस्वीर से पता चलता है कि कोई कहाँ गया था; उससे यह नहीं पता चलता कि वहाँ जाने से पहले उसका दिन कितना कठिन था।
उस शाम दुकान बंद होने के बाद उदय ने उसे लंबा संदेश नहीं भेजा। उसने समय पूछा कि कब आराम से बात हो सकती है। रविवार की सुबह तय हुई। इस बार बातचीत में दुकान की बिक्री के साथ अलमारी बनाने वाले कारीगर का नाम भी आया, जिसका भुगतान समय पर करना उदय के लिए जरूरी था। नीरजा ने अपने काम की सफलता के साथ एक अस्वीकृत प्रस्ताव की निराशा भी बताई।
उदय को लगा कि वह अपने पुराने मित्र से फिर परिचित हो रहा है। सोशल पृष्ठ पर दिखने वाली चुनी हुई झलकियाँ गलत नहीं थीं, लेकिन अधूरी थीं। नीरजा सचमुच पहाड़ों पर गई थी और सचमुच खुश भी हुई थी। उसी व्यक्ति को समय सीमा, परिवार और अनिश्चित आय की चिंता भी हो सकती थी। किसी एक चित्र से बाकी जीवन गायब नहीं हो जाता।
कुछ दिन बाद नीरजा के काम का नया संस्करण प्रकाशित हुआ। उदय ने उसकी तस्वीर साझा की, लेकिन इस बार केवल एक चिह्न लगाकर नहीं रुका। उसने पूछा कि क्या वह दुकान में बच्चों के लिए उससे पुस्तक चुनने पर छोटी बातचीत करा सकता है। नीरजा तैयार हो गई। यह किसी बड़े कार्यक्रम की शुरुआत नहीं थी। छह बच्चे, कुछ कुर्सियाँ और पढ़ने को लेकर बहुत से सरल प्रश्न थे।
अब भी कभी उत्तर देर से आता था। उदय को कभी कभी बुरा भी लगता था। फर्क यह था कि वह चुप्पी का अर्थ अपने आप तय नहीं करता था। जरूरत होने पर सीधे कह देता कि बात करनी है। नीरजा भी काम के बीच अपनी अनुपलब्धता बता देती। दोस्ती में स्पष्टता ने अनुमान की जगह थोड़ी कम कर दी थी।
दुकान के एक कोने में वे बुकमार्क रखे रहे। कोई बच्चा किताब के लिए उन्हें चुनता तो उदय बताता कि एक मित्र ने बनाए हैं। उसे अब यह प्रमाण देने की जरूरत नहीं लगती थी कि मित्र ने सार्वजनिक रूप से कितनी बधाई दी थी। कुछ रिश्ते स्क्रीन पर कम दिखाई देते हैं, लेकिन समय आने पर मेज पर रखे एक छोटे लिफाफे की तरह पूरा साथ दे जाते हैं।