स्क्रीन की पाँच खिड़कियाँ: रोहित की सूची में कैसे बदला काम का क्रम

ग्राहक के लिए तैयार की जाने वाली सूची बनाते समय रोहित के सामने पाँच खिड़कियाँ खुली थीं। एक में वस्तुओं के नाम, दूसरी में पुराने दाम, तीसरी में ईमेल और चौथी में समूह की बातचीत। पाँचवीं में वह आने वाले कार्यक्रम की तस्वीरें चुन रहा था। उसे लगता कि वह एक ही समय में बहुत आगे बढ़ रहा है। दोपहर तक कई कामों में कुछ कुछ लिखा जा चुका था। लेकिन अंतिम सूची भेजने से पहले पता चला कि दो दाम गलत पंक्ति में चले गए हैं और ग्राहक का एक जरूरी प्रश्न अभी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है।
सहकर्मी दिव्या ने गलती देखी तो रोहित ने कहा कि आज बहुत काम हैं। यह सच था। दिव्या ने भी व्यस्तता मानी, फिर पूछा कि सूची बनाते समय तस्वीरें चुनना जरूरी था क्या। रोहित ने कहा कि दोनों काम करने ही थे, इसलिए साथ शुरू किए। उसने कभी अलग से नहीं देखा था कि एक काम से दूसरे पर जाते हुए उसे फिर संदर्भ पकड़ने में कितना समय लगता है। उसे केवल यह दिखाई देता था कि स्क्रीन खाली नहीं है और वह लगातार सक्रिय है।
उस दिन दोनों ने सूची को पहले ठीक किया। फिर रोहित ने अगली सूची बनाते समय सामान्य बातचीत की खिड़की थोड़ी देर बंद रखी और तस्वीरों का काम अलग समय के लिए लिखा। जरूरी संपर्क देखने का रास्ता रखा, क्योंकि ग्राहक का संदेश आ सकता था। वह दुनिया से पूरी तरह कटकर काम नहीं कर सकता था। लेकिन हर उपलब्ध सूचना को उसी क्षण सामने रखना भी जरूरी नहीं था। उसके लिए यह पूर्ण एकाग्रता का प्रदर्शन नहीं, एक खास काम की गलती कम करने की कोशिश थी।
पहले कुछ मिनट बार बार दूसरी खिड़की खोलने का मन हुआ। उसे लगता कि कुछ छूट जाएगा। उसने एक कागज पर बीच में याद आने वाले काम लिख दिए, ताकि उसी समय शुरू न करने पड़ें। सूची का एक हिस्सा पूरा हुआ तो उसने रुककर पंक्तियाँ मिलाईं। इस बार उसे याद था कि कौन सा दाम कहाँ से लिया गया है। जाँच फिर भी जरूरी थी और उसमें समय लगा। लेकिन हर बार अपनी ही पिछली अधूरी जगह खोजने की परेशानी कुछ कम थी।
बाद में उसने तय समय पर संदेश देखे। कुछ का उत्तर तुरंत दिया, एक के लिए दूसरे व्यक्ति की जानकारी चाहिए थी। उसने उसे अलग रखा और तस्वीरें चुनने बैठा। उस काम में भी फोन पर आधी बातचीत साथ चलाने के बजाय पहले चयन पूरा किया। दिन के अंत में सभी काम समाप्त नहीं हुए थे। रोहित को कोई असंभव नई क्षमता नहीं मिली थी। पर कुछ काम ऐसे रूप में पूरे हुए थे, जिन्हें अगले व्यक्ति को बिना बार बार वापस लौटाए दिया जा सकता था।
अगले सप्ताह अचानक दो जरूरी माँगें एक साथ आईं। रोहित ने केवल अपना नया तरीका बचाने के लिए उन्हें अनदेखा नहीं किया। उसने प्राथमिकता पूछी, एक का उत्तर पहले दिया और दूसरे के लिए अपेक्षित समय बताया। जहाँ सचमुच साथ संभालना पड़ता था, वहाँ अपनी सीमा पहचानकर सहयोग माँगा। उसने पाया कि हर बात को अकेले और एक साथ कर लेना ही कुशलता का एकमात्र रूप नहीं है। कभी साफ क्रम तय करना और किसी काम को थोड़ी देर रुकने की सूचना देना भी काम का हिस्सा है।
शाम को उसने स्क्रीन की खुली खिड़कियाँ बंद कीं। पहले उसे उनकी संख्या देखकर अपनी व्यस्तता का भरोसा मिलता था। अब उसने भेजी हुई सही सूची और तय किए गए अगले कदम देखे। गतिविधि और प्रगति के बीच का अंतर उसे थोड़ा अधिक समझ आ रहा था। अगले दिन फिर कई काम होंगे और कुछ अचानक भी आएँगे। वह हर समय एक ही काम कर पाए, यह दावा नहीं था। बस जहाँ संभव हो, वहाँ एक काम को पर्याप्त ध्यान देकर आगे बढ़ाएगा। अधूरे पाँच आरंभों की जगह कभी एक भरोसेमंद पूरा हिस्सा भी दिन को अधिक उपयोगी बना सकता है।