वैदिक प्रेरणा

दस कामों में चार निशान: तुषार ने पूरे दिन का हिसाब देखा

वैदिक प्रेरणा2026-10-22समय और जीवनदृष्टि • कथा
दस कामों में चार निशान: तुषार ने पूरे दिन का हिसाब देखा
दिन समाप्त होने पर तुषार अपनी सूची खोलता और सबसे पहले अधूरे काम गिनता। सुबह दस बातें लिखी थीं, रात को चार पर निशान था। उसे लगता कि पूरा दिन निकल गया और कुछ खास हुआ ही नहीं। वह यह भूल जाता कि दोपहर में एक जरूरी कॉल आया था, घर का एक अचानक काम किया था और सहकर्मी की अनुपस्थिति में अतिरिक्त जिम्मेदारी उठाई थी। ये बातें सूची में नहीं थीं, इसलिए उसके दिन के हिसाब में भी ठीक से शामिल नहीं होती थीं। कागज पर बचे छह काम पूरे दिन पर भारी पड़ जाते। एक शाम मित्र श्रुति ने पूछा कि दिन कैसा गया। तुषार ने कहा कि फिर कुछ पूरा नहीं हुआ। श्रुति ने सामान्य बातचीत में उसके दिन की बातें पूछीं तो कई काम सामने आए। उसने कहा कि फिर कुछ नहीं हुआ कैसे। तुषार ने अपनी सूची दिखाई। श्रुति ने उसे अच्छा महसूस कराने के लिए केवल तारीफ नहीं की। उसने पूछा कि इस सूची में जरूरी काम, इच्छा और कभी कर लेने वाली बातें अलग कहाँ हैं। तुषार ने देखा कि कमरे की अलमारी ठीक करने और अगले दिन की रिपोर्ट भेजने को उसने एक ही तरह लिखा था। अगली सुबह उसने सूची छोटी की। दो ऐसे काम ऊपर रखे, जिनका समय तय था। बाकी में कुछ इस सप्ताह के थे और कुछ केवल विचार। उसने दिन में अप्रत्याशित कामों की जगह भी पूरी तरह शून्य नहीं मानी। इससे सब कुछ तुरंत आसान नहीं हुआ। एक काम फिर लंबा चला और दूसरा बीच में रुक गया। लेकिन रात को सूची पढ़ते समय अब उसे यह पहचानने का आधार मिला कि कौन सा अधूरापन सचमुच ध्यान चाहता है और कौन सा केवल भविष्य की इच्छा है। उसने दिन में किए गए ऐसे काम भी नीचे लिखे, जो शुरुआत में सूची में नहीं थे। यह अपनी उपलब्धियाँ बढ़ाकर दिखाने का खेल नहीं था। उसे दिन का अधिक सही चित्र चाहिए था। एक छोटी खरीद, एक जरूरी बातचीत और किसी लंबित समस्या का स्पष्ट उत्तर भी समय लेते थे। यदि वे दर्ज न हों तो उसका समय गायब दिखाई देता। उसने यह भी देखा कि कुछ समय सचमुच बिना उद्देश्य फोन में चला जाता है। सही हिसाब में अपनी मेहनत और अपनी भटकन दोनों के लिए जगह थी। शुक्रवार को एक जरूरी काम फिर नहीं हुआ। पहले वह सारी सूची देखकर स्वयं को लापरवाह कह देता। इस बार उसने उस एक काम के रुकने का कारण देखा। उसके लिए दूसरे व्यक्ति से जानकारी चाहिए थी, जिसे उसने समय से माँगा ही नहीं था। उसने अगला छोटा कदम लिखा और जानकारी का अनुरोध तैयार किया। समस्या अब उसके पूरे स्वभाव का फैसला नहीं थी। वह प्रक्रिया की एक विशेष कमी थी, जिस पर काम हो सकता था। अपराधबोध से अधिक उपयोगी उसे यह स्पष्टता लगी। सप्ताहांत पर उसने पुरानी सूचियाँ पलटीं। कई काम बार बार आगे बढ़ रहे थे। कुछ अब महत्वपूर्ण नहीं रहे थे, इसलिए हटाए। एक काम के बारे में उसने माना कि वह उसे करना चाहता ही नहीं, केवल किसी और की उम्मीद से लिखता जा रहा था। उसने संबंधित व्यक्ति से अपनी उपलब्धता साफ की। अधूरी पंक्ति मिटाने से जिम्मेदारी अपने आप समाप्त नहीं होती, यह वह जानता था। लेकिन सूची को हर पुराने विचार का स्थायी बोझ बना देना भी जरूरी नहीं था। निर्णय लेकर हटाना और भूलकर टालना अलग बातें थीं। रात को नई सूची बंद करते समय तीन काम बाकी थे। तुषार ने उन्हें देखा, उचित अगला समय लिखा और किताब रख दी। उसे पूरा संतोष नहीं था, मगर दिन को पूरी तरह असफल कहने की जल्दी भी नहीं रही। सूची उसके काम में मदद करने का साधन थी, उसके दिन का एकमात्र न्यायाधीश नहीं। उसमें जीवन का वह हिस्सा भी दिखाई देना चाहिए था, जो सुबह अनुमान में नहीं था। अगले दिन उसे फिर काम करना था। वह अपने साथ छह अधूरी पंक्तियों का दंड नहीं, कुछ स्पष्ट अगले कदम लेकर सोने जा रहा था।

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