टोकरी वहीं रखी रही: लावण्या की बालकनी के कुछ शांत मिनट

रविवार की सुबह लावण्या ने कोई काम नहीं रखा था। पिछले सप्ताह लगातार बाहर रहना पड़ा था और घर लौटते ही छोटे काम जमा मिलते थे। उसने सोचा कि आज कुछ देर शांत बैठेगी। चाय लेकर बालकनी में आई ही थी कि मेज पर पड़ी कपड़ों की टोकरी दिख गई। फिर रसोई का एक डिब्बा याद आया और फोन में अधूरे संदेश। आधे घंटे बाद वह फिर काम में लगी थी। शाम को किसी ने पूछा कि छुट्टी कैसी बीती तो उसने कहा कि पता ही नहीं चला। बैठने का समय मिला था, लेकिन बैठने की अनुमति उसने खुद को नहीं दी थी।
अगले दिन सहकर्मी वसुंधरा ने दोपहर में कुछ देर बाहर चलने को कहा। लावण्या ने उत्तर दिया कि पहले सारे संदेश निपटा ले। वसुंधरा ने अपनी सुविधा के अनुसार समय बताया और चली गई। लावण्या ने देखा कि संदेशों का अंत नहीं हो रहा। वह एक उत्तर देती तो दूसरा आ जाता। यह जरूरी काम था, लेकिन उसे पूरा करके ही थोड़ा रुकना संभव मानने पर विराम लगातार आगे खिसकता जाता। उसे लगा कि उसने आराम को दिन का वैध हिस्सा नहीं, सब कुछ समाप्त होने के बाद मिलने वाला पुरस्कार बना दिया है।
शाम को उसने अपनी दिनचर्या देखी। कुछ जिम्मेदारियाँ सचमुच समय पर निभानी थीं। कुछ काम केवल आदत से उसी समय उठाए जा रहे थे। उसने अगले रविवार के लिए लंबी सुधार योजना नहीं बनाई। केवल दोपहर का एक छोटा हिस्सा अपने लिए खाली रखा और घर के लोगों को बताया कि उस समय वह बाहर की छत पर किताब लेकर बैठेगी। जरूरत पड़े तो बात हो सकती थी, लेकिन सामान्य छोटे काम बाद में रखे जाएँगे। यह घोषणा किसी से दूर होने की नहीं, अपने समय की एक स्पष्ट सूचना थी।
रविवार आया तो बैठते ही उसे फिर टोकरी याद आई। उसने मन में कहा कि टोकरी वहीं है और तय समय के बाद देखी जा सकती है। किताब के दो पन्ने पढ़े, फिर कुछ देर बिना पढ़े सामने के पेड़ देखती रही। उसे तुरंत कोई बड़ा आनंद नहीं मिला। खाली बैठने में भी बेचैनी थी। उसने उस बेचैनी को देखकर तुरंत उठकर काम शुरू नहीं किया। थोड़ी देर बाद चाय ठंडी हो गई और उसे हँसी आई। बिना किसी उपयोगी परिणाम के बीते ये कुछ मिनट भी उसके दिन का हिस्सा थे।
समय समाप्त होने पर वह नीचे आई। काम बाकी थे, लेकिन वह अब उन्हें नाराज होकर नहीं देख रही थी। उसने कुछ किए और कुछ अगले दिन रखे। परिवार के एक सदस्य ने अपना छोटा काम स्वयं कर लिया था। लावण्या को पता चला कि हर खाली जगह उसकी उपलब्धता मान लेने की आदत केवल दूसरों में नहीं थी; वह भी पूछे जाने से पहले आगे बढ़ जाती थी। जहाँ सहयोग आवश्यक था, वहाँ वह करती रही। जहाँ जिम्मेदारी बाँटी जा सकती थी, वहाँ बातचीत शुरू हुई।
कुछ सप्ताह बाद एक व्यस्त रविवार में उसका तय विराम नहीं हो पाया। पहले वह सोचती कि अब पूरी व्यवस्था बेकार है। इस बार अगले दिन उपलब्ध थोड़ी जगह में बैठी। उसे अपनी योजना का पालन करते हुए किसी कठोर परीक्षा में सफल नहीं होना था। उसे अपने जीवन में रुक सकने की वास्तविक जगह बनाए रखनी थी। कभी वह पढ़ती, कभी संगीत सुनती और कभी चुप रहती। यह समय अपने आप हर कठिनाई दूर नहीं करता था। लेकिन हर मिनट को काम की उपयोगिता में बदलने का दबाव कुछ हल्का करता था।
एक शाम बालकनी की कुर्सी पर बैठते समय उसने फोन मेज पर रखा और खिड़की से आती आवाज सुनी। उसे लगा कि वह कोई असाधारण काम नहीं कर रही। फिर भी पहले ऐसी साधारण जगह बनाना कठिन था। आराम की उसकी छोटी अनुमति में जिम्मेदारियों को छोड़ देने का विचार नहीं था। उसमें यह स्वीकार था कि जिम्मेदारियाँ निभाने वाला व्यक्ति भी अपनी उपस्थिति के साथ जीता है। अगला काम सामने था और वह उसे उचित समय पर करेगी। इस क्षण को तुरंत अगले काम की सीढ़ी बनाने की जरूरत नहीं थी। वह कुछ देर केवल बैठ सकती थी।