तीन संदेश और एक अधूरी रात: हर्षिता ने समय पूछना शुरू किया

कार्यालय से लौटते समय हर्षिता के फोन पर तीन संदेश आए। एक मित्र ने कार्यक्रम का पोस्टर देख लेने को कहा था, दूसरे ने सप्ताहांत की बैठक पूछी और घर से कुछ जरूरी सामान लाने की याद आई। उसे उसी रात अपना काम भी पूरा करना था। उसने तीनों को तुरंत हाँ लिख दिया। रास्ते में उसे लगा कि सब छोटे काम हैं, हो जाएँगे। घर पहुँचकर हर छोटा काम किसी अगले छोटे काम से जुड़ गया। रात गहरी हुई तो अपना मुख्य काम अधूरा था और तीन लोगों को दिया समय भी ठीक से निभा नहीं पाई थी।
सुबह उसने सबसे पहले अपने आप को दोष दिया। उसे लगा कि वह दूसरों जितना व्यवस्थित काम नहीं कर सकती। फिर कैलेंडर देखा तो पिछले कई दिनों का यही क्रम मिला। कोई पूछता, वह उपलब्ध समय देखे बिना सहमति दे देती। मदद करने की इच्छा वास्तविक थी। कठिनाई यह थी कि हर आग्रह को अभी करना आवश्यक मान लेती थी। सामने वाले की अपेक्षा और अपनी अनुमानित अपेक्षा के बीच अंतर नहीं करती थी। कई बार व्यक्ति ने केवल पूछा होता था, तुरंत उत्तर या उसी रात काम की माँग नहीं की होती।
उसने मित्र नीरज से पोस्टर की बात की। नीरज ने कहा कि उसे अगले सप्ताह तक देखना था, उसी रात नहीं। हर्षिता को हँसी भी आई और खीझ भी। उसने बिना पूछे अपने लिए समय की कमी बना ली थी। दूसरे मित्र ने बताया कि बैठक की पुष्टि दो दिन बाद भी हो सकती है। घर के सामान में कुछ चीजें जरूरी थीं, कुछ बाद में आ सकती थीं। सभी काम सचमुच मौजूद थे, लेकिन सबकी समय सीमा एक जैसी नहीं थी। यह फर्क पूछने के लिए उसे एक छोटा संदेश ही भेजना था।
अगली शाम उसने अपने सामने रखे काम लिखे। केवल लंबी सूची नहीं बनाई, हर काम के साथ यह भी देखा कि किस समय तक करना जरूरी है और उसके न होने से किसे असर पड़ेगा। कुछ निजी काम वह बिना कारण टालती आ रही थी। उन्हें भी जगह दी। फिर पोस्टर देखने के लिए एक निश्चित समय बताया। मित्र ने स्वीकार कर लिया। हर्षिता को लगा कि अस्पष्ट हाँ से अधिक उपयोगी वह उत्तर है, जिसमें सामने वाला जान सके कि क्या और कब मिलेगा।
एक नया अनुरोध आया तो उसने तुरंत मना भी नहीं किया। उसने कहा कि समय देखकर बताएगी। पहले यह वाक्य उसे असहयोगी लगता था। अब उसने देखा कि थोड़ी देर बाद दिया स्पष्ट उत्तर संबंध को जरूरी रूप से खराब नहीं करता। कुछ लोगों को जल्दी थी, इसलिए उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। कुछ प्रतीक्षा कर सके। उसे हर काम का अकेला रास्ता बने रहने की जरूरत नहीं थी। जहाँ वह समय दे सकती थी, वहाँ ध्यान से दे सकती थी। जहाँ नहीं दे सकती थी, वहाँ अधूरी सहमति से भ्रम बढ़ाने का अर्थ नहीं था।
सप्ताहांत पर उसकी सूची पूरी नहीं हुई। एक काम अप्रत्याशित रूप से लंबा चला और एक निजी जरूरत आ गई। फर्क यह था कि अब छूटे हुए काम चुपचाप इंतजार नहीं कर रहे थे। उसने जिनसे समय तय किया था, उन्हें बदलाव बताया। कुछ काम अगले दिन रखे और एक जिम्मेदारी किसी दूसरे को सौंपने पर सहमति ली। उसे यह व्यवस्था अपनी गति का चमत्कार नहीं लगी। काम उतने ही समय लेते थे। केवल सबको एक साथ पकड़ लेने की कोशिश से पैदा हुई उलझन कुछ कम थी।
रात को फोन अलग रखते हुए हर्षिता ने देखा कि एक संदेश अभी उत्तर चाहता है। उसने पढ़कर समझा कि सुबह उत्तर देना पर्याप्त होगा। इस बार फोन रख देने के बाद मन में अपराधबोध का पूरा सिलसिला शुरू नहीं हुआ। वह जिम्मेदारी से बच नहीं रही थी; उसे उचित समय दे रही थी। हर काम का सम्मान उसे तुरंत शुरू करके ही नहीं किया जाता। कुछ काम स्पष्ट उत्तर, यथार्थ समय और पूरा ध्यान माँगते हैं। अगले दिन की शुरुआत में उसके पास फिर कई काम होंगे, लेकिन उन सबको इसी क्षण समाप्त करने की शर्त उसने अपने ऊपर से थोड़ी हल्की कर दी थी।