सौ तस्वीरों के बाद हवा का सवाल: इशिता ने यात्रा को थोड़ा ठहरकर देखा

यात्रा की पहली शाम से लौटकर इशिता ने फोन खोला तो उसमें सौ से अधिक तस्वीरें थीं। झील, सड़क, चाय की दुकान, होटल की खिड़की और रास्ते के पेड़ों तक की तस्वीरें। उसकी मित्र माया ने पूछा कि शाम की हवा कैसी थी। इशिता ने जवाब देने के बजाय झील की तस्वीर दिखा दी। माया ने हँसकर कहा कि दृश्य तो सुंदर है, पर हवा तस्वीर में कहाँ है। इशिता भी हँसी, फिर उसे लगा कि इतने चित्र लेने के बाद भी उस शाम का अपना अनुभव बताना उसे कठिन पड़ रहा है।
अगली सुबह वे एक पुराने घाट तक गईं। इशिता ने पहुँचते ही कैमरा खोला और सबसे अच्छा कोण खोजने लगी। सीढ़ियों पर बैठते समय भी उसका ध्यान इस बात पर था कि फ्रेम में कौन आ रहा है। माया कुछ दूर बैठकर पानी देखती रही। इशिता ने उसकी तस्वीर लेने के लिए फोन उठाया, फिर पूछा कि वह चाहेगी क्या। माया ने कहा कि अभी नहीं, थोड़ी देर केवल बैठना चाहती है। इशिता ने फोन नीचे कर दिया। उसे यह छोटा विराम पहले असहज लगा, जैसे कुछ छूट रहा हो।
बिना कैमरे के बैठे हुए उसे आसपास की आवाजें अधिक याद रहने लगीं। पानी के पास किसी रस्सी की हल्की चरमराहट थी। ऊपर से गुजरती साइकिल की घंटी सुनाई दी। सीढ़ी का पत्थर धूप आने पर धीरे गर्म हो रहा था। ये चीजें किसी सुंदर फ्रेम में तुरंत नहीं समाती थीं। इशिता ने देखा कि तस्वीर बनाते समय वह एक अनुभव चुनती है, बाकी बहुत कुछ बाहर रह जाता है। यह कैमरे की खराबी नहीं थी। कठिनाई तब थी जब वह चुने हुए हिस्से को पूरी यात्रा समझने लगी थी।
कुछ देर बाद उसने फिर फोन निकाला। इस बार जल्दी में हर दिशा की तस्वीर नहीं ली। सीढ़ियों की रेखा और पानी में पड़ती रोशनी का एक दृश्य चुना। किसी अनजान व्यक्ति का चेहरा प्रमुखता से आए बिना फ्रेम बनाया। तस्वीर देखने के बाद फोन बैग में रख दिया। माया ने पूछा कि बस इतनी। इशिता ने कहा कि शायद अभी इतनी पर्याप्त है। उसने तस्वीर लेना छोड़ा नहीं था। उसने उसके साथ बाकी अनुभव को भी समय देना शुरू किया था।
दोपहर को बाजार में एक कारीगर काम कर रहा था। इशिता को उसका काम आकर्षक लगा। पहले वह दूर से तस्वीर लेकर आगे बढ़ जाती। इस बार उसने पहले पूछा कि क्या वह काम देख सकती है और बाद में तस्वीर लेने की अनुमति माँगी। कारीगर ने अपने हाथों और औजार की तस्वीर लेने दी, चेहरा शामिल न करने को कहा। इशिता ने उसी अनुसार फ्रेम रखा। उसे अच्छा लगा कि लौटकर तस्वीर के साथ काम के बारे में हुई छोटी बातचीत भी याद रहेगी। सामने वाला व्यक्ति दृश्य का हिस्सा भर नहीं रह गया था।
घर लौटने पर उसने तस्वीरें चुनीं। कुछ बहुत सुंदर थीं, कुछ केवल स्मृति के लिए। उसने हर चित्र को साझा नहीं किया और माया की तस्वीर भेजने से पहले उससे पूछा। यात्रा के बारे में लिखते समय इस बार उसके पास कैमरे से बाहर की बातें भी थीं। घाट की हवा, चाय का इंतजार, रास्ते में गलत मोड़ और कुछ देर बिना बोले बैठना। इन अनुभवों को लिखने के लिए उन्हें तस्वीर में साबित करना जरूरी नहीं था। वे उसके समय का हिस्सा थे, भले फोन में उनके लिए अलग फाइल न बनी हो।
कुछ सप्ताह बाद इशिता फिर अपने शहर की झील पर गई। फोन साथ था और कैमरा भी अच्छा था। उसने एक तस्वीर ली, फिर पानी देखने लगी। उसे याद रखने और दर्ज करने के बीच दुश्मनी नहीं दिख रही थी। दोनों साथ रह सकते थे, यदि हर क्षण को तुरंत दिखाने योग्य बनाने की जल्दी न हो। उस शाम घर लौटकर माया ने फिर हवा के बारे में पूछा। इशिता ने इस बार तस्वीर भेजने से पहले लिखा कि धूप उतरने के बाद हवा हल्की ठंडी थी और वे जितनी देर बैठी थीं, उससे अधिक देर बैठने का मन कर रहा था।