चाय के खर्च की पर्ची: इला और विशाल के बीच साफ हुई बात

पड़ोस के पुस्तक संवाद के लिए चाय और बैठने की व्यवस्था करने का काम इस बार इला ने लिया था। उसने एक परिचित दुकान से कुछ सामान मँगाया और खर्च का हिसाब छोटी डायरी में लिख लिया। कार्यक्रम अच्छा रहा। शाम को सब लौट गए तो उसने समूह में कुल रकम लिखकर साझा कर दी। अगले दिन विशाल ने पूछा कि सामान की रसीद भी मिल सकती है क्या। इला का मन अचानक कसैला हो गया। इतने लोगों के लिए समय निकालने के बाद उसे यह प्रश्न अपने ऊपर संदेह जैसा लगा।
उसने तुरंत उत्तर नहीं दिया। मन में कई वाक्य आते रहे कि यदि विश्वास नहीं है तो अगली बार कोई और व्यवस्था करे। पति ने कहा कि शायद विशाल केवल हिसाब पूरा करना चाहता हो। इला को यह बात तर्क से ठीक लगी, फिर भी उसका दुख कम नहीं हुआ। उसे याद आया कि सामान लाने में अपना समय और पेट्रोल भी लगा था, जिन्हें उसने हिसाब में रखा ही नहीं। उसके मन में काम की सराहना की अपेक्षा थी और सामने खर्च का एक प्रश्न आ गया था।
शाम को विशाल ने फोन किया। उसने बताया कि वह समूह का मासिक विवरण तैयार कर रहा है। पिछले आयोजनों की पर्चियाँ भी एक फाइल में लगाई जा रही थीं। उसने किसी खास व्यक्ति के लिए अलग नियम नहीं रखा था। इला ने पहली बार अपनी नाराजगी साफ कही। विशाल ने सुना और कहा कि उसके संदेश का ढंग कुछ रूखा लगा होगा। वह उसके समय और मेहनत की कद्र करता है, लेकिन खर्च का विवरण अलग जरूरत है। दोनों बातें एक दूसरे को रद्द नहीं करतीं।
इला ने डायरी निकाली। कुछ सामान की पक्की पर्ची थी, कुछ छोटी खरीद का केवल उसका लिखा हुआ विवरण। उसने जो उपलब्ध था, उसकी साफ तस्वीरें भेजीं। जहाँ पर्ची नहीं थी, वहाँ वस्तु, रकम और तारीख लिख दी। उसने कोई अनुमानित पर्ची बनाकर कमी भरने की कोशिश नहीं की। विशाल ने उसी रूप में विवरण रखा और अगली बार पहले से प्रक्रिया तय करने का सुझाव दिया। इला को लगा कि अधूरापन स्वीकार करना बचाव में खड़े रहने से हल्का है। उसे हर प्रश्न का अर्थ आरोप मानने की जरूरत नहीं थी।
अगले आयोजन की बैठक में काम बाँटे गए तो इला ने कहा कि सामान खरीदने से पहले अनुमान और बाद में उपलब्ध बिल साझा किए जाएँ। यदि किसी छोटे खर्च का दस्तावेज न मिले तो उसे साफ लिखा जाए। समूह ने अपने छोटे आयोजन के लिए यह तरीका अपनाया। साथ ही तय हुआ कि व्यवस्था करने वाले व्यक्ति को सामान लाने की जिम्मेदारी अकेले न उठानी पड़े। दो लोग बारी बारी सहयोग करेंगे। खर्च की स्पष्टता के साथ मेहनत की पहचान भी बातचीत में आ सकी।
विशाल ने उस महीने की बैठक में इला को धन्यवाद दिया। उसने यह धन्यवाद इस तरह नहीं दिया कि अब रसीद माँगने की क्षतिपूर्ति हो गई हो। उसने वास्तविक काम का उल्लेख किया और आगे के सहयोग की बात कही। इला ने भी स्वीकार किया कि लिखित हिसाब होने से उसे बार बार मौखिक सफाई नहीं देनी पड़ती। जो रकम याद रखने में कठिन लगती थी, वह कागज पर सरल हो गई थी। समूह के नए सदस्य भी पुराने परिचय के बिना व्यवस्था समझ सकते थे।
कुछ समय बाद सामान लाने की बारी विशाल की आई। उसने फाइल में बिल लगाया तो इला हँसकर बोली कि चाय के कप गिनना मत भूलना। इस बार हँसी में कोई पुराना ताना नहीं था। दोनों ने कप गिने, मेज लगाई और लोगों का इंतजार किया। इला के लिए विश्वास अब ऐसा शब्द नहीं रहा था, जिसके सहारे हर प्रश्न रोका जाए। वह ऐसी जगह बन रहा था, जहाँ प्रश्न पूछे भी जा सकें और काम करने वाले का सम्मान भी बना रहे। छोटी रसीद ने संबंध को छोटा नहीं किया था; उसने अनकही आशंकाओं के लिए थोड़ी कम जगह छोड़ी थी।