मिट्टी के दो कटोरे: गरिमा ने मदद का ढंग बदला

मिट्टी के बर्तनों की छोटी कार्यशाला शुरू होने से पहले गरिमा ने कमरे में रखी मेजें गिनीं। पिछले सप्ताह ही उसने पड़ोस की एक परिचित, मृणाल, को यहाँ आने का निमंत्रण दिया था। मृणाल घर से कुछ काम करती थी और नए लोगों के बीच जाने में संकोच करती थी। गरिमा को लगा था कि यह जगह उसे पसंद आएगी। उसने आयोजक से मृणाल की फीस कम करने की बात भी कर ली थी। यह बात करते समय उसे अपना व्यवहार बहुत सहायक लगा। उसने मृणाल से पूछना जरूरी नहीं समझा था।
पहले दिन मृणाल समय पर आ गई। उसने मेज पर रखे कटोरों को ध्यान से देखा और दो रंगों के बारे में पूछा। बातचीत अच्छी चल रही थी कि गरिमा ने सबके सामने कहा कि मृणाल के लिए विशेष व्यवस्था की गई है, इसलिए उसे निश्चिंत होकर सीखना चाहिए। मृणाल की आँखें मेज पर टिक गईं। उसने गरिमा का धन्यवाद किया, लेकिन बाकी समय कम बोली। लौटते हुए उसने अगले सप्ताह की फीस अपने खाते से जमा करने की बात कही। गरिमा को उसका यह आग्रह अनावश्यक लगा।
घर पहुँचकर गरिमा ने संदेश लिखा कि मदद स्वीकार करने में झिझक कैसी। फिर उसने संदेश भेजने से पहले पढ़ा। उसमें मृणाल की बात जानने की कोई जगह नहीं थी। अगले दिन फोन पर उसने पूछा कि कल कुछ असहज लगा क्या। मृणाल ने थोड़ी देर बाद कहा कि फीस के बारे में वह पहले बात करना चाहती थी। उसके लिए सबसे कठिन बात सबके सामने अपनी स्थिति की घोषणा सुनना था। वह वहाँ मिट्टी का काम सीखने गई थी, किसी की विशेष कृपा का परिचय लेकर बैठने नहीं।
गरिमा ने समझाना चाहा कि उसका ऐसा उद्देश्य नहीं था। मृणाल ने कहा कि वह उद्देश्य पर संदेह नहीं कर रही, केवल अपने अनुभव की बात बता रही है। गरिमा चुप हुई। उसे पिछली कई घटनाएँ याद आईं, जब उसने किसी के लिए कुछ करके उसका उल्लेख दूसरों से कर दिया था। हर बार वह प्रशंसा नहीं चाहती थी, लेकिन हर बार सामने वाले की अनुमति भी नहीं लेती थी। उसे लगा कि अपनी अच्छी मंशा बताना आसान है, अपने व्यवहार का असर सुनना कुछ कठिन।
उसने मृणाल से पूछा कि अब क्या किया जाए। मृणाल ने कहा कि फीस की बात वह स्वयं आयोजक से कर लेगी। गरिमा को कोई नई सफाई सबके सामने देने की आवश्यकता नहीं थी। दोनों अगली बार साथ जा सकती थीं और सामान्य प्रतिभागियों की तरह बैठ सकती थीं। गरिमा ने यह छोटी बात स्वीकार की। उसे लगा था कि गलती सुधारने के लिए भी कोई बड़ा काम करना होगा। यहाँ सुधार का मतलब कुछ अधिकार वापस देना था, जिन्हें उसने मदद करते समय अनजाने में अपने पास रख लिया था।
अगली कार्यशाला में मृणाल ने कटोरे का किनारा बनाने का एक तरीका जल्दी समझ लिया। गरिमा की मिट्टी बार बार झुक रही थी। उसने मृणाल से पूछा तो मृणाल ने अपना औजार देकर तरीका दिखाया। दोनों हँस पड़ीं। इस बार उनके बीच देने और लेने की दिशा स्थिर नहीं थी। कोई एक सदा सहारा देने वाला और दूसरी सदा सहारा पाने वाली नहीं थी। गरिमा ने अपने कटोरे की टेढ़ी रेखा देखी और सोचा कि संबंध भी शायद इसी तरह अभ्यास से आकार लेते हैं।
कुछ सप्ताह बाद कार्यशाला में नए प्रतिभागियों के लिए सामग्री जुटाई गई। गरिमा ने योगदान दिया, लेकिन किसी खास व्यक्ति की कहानी जोड़कर उसका प्रचार नहीं किया। जिन लोगों के लिए व्यवस्था बननी थी, उनकी राय आयोजक ने अलग से पूछी। मृणाल भी सामग्री की सूची बनाने में शामिल थी। लौटते समय उसने अपने बनाए दो छोटे कटोरे दिखाए। गरिमा ने उनके रंग की तारीफ की। बातचीत में उस दिन न उपकार की गिनती थी, न बदले में कृतज्ञता की अपेक्षा। सीखने की एक साझा जगह थी, जिसमें दोनों अपने पूरे सम्मान के साथ बैठ सकती थीं।