नए घर के नीचे शतरंज की मेज: मानवेंद्र जी का बदलता परिचय

नई इमारत में पहले सप्ताह मानवेंद्र जी को अधिकतर लोग अंकल कहकर नमस्ते करते और आगे बढ़ जाते। इसमें कोई अशिष्टता नहीं थी, फिर भी उन्हें कुछ कमी लगती। पुराने शहर में वे वर्षों विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे थे। परिचित लोग उनका नाम जानते, पुराने कार्यक्रमों की बात करते और रास्ते में रुककर हाल पूछते। यहाँ वे एक नए फ्लैट में रहने आए व्यक्ति थे। इकसठ वर्ष की उम्र में घर बदलना केवल सामान की जगह बदलना नहीं निकला। उनके दिन में जो परिचय अपने आप मौजूद रहता था, वह पीछे छूट गया था।
बेटी ने कहा कि समय लगेगा। मानवेंद्र जी जानते थे, फिर भी हर शाम पुराने मित्रों को फोन करने के बाद नई जगह अधिक शांत लगती। उनका मन हुआ कि पड़ोसियों को अपना पूरा काम और पुराना पद बता दें। फिर सोचते कि क्या इससे बातचीत शुरू होगी या वे किसी औपचारिक परिचय में बदल जाएँगे। उन्हें विशेष सम्मान की माँग नहीं करनी थी। बस अपने अनुभव, रुचि और सामान्य दिन की बात कह सकने वाला परिचय चाहिए था। यह जरूरत उन्होंने पहली बार साफ शब्दों में बेटी से कही।
एक रविवार नीचे बैठे तो पास की मेज पर शतरंज की गोटियाँ रखी थीं। पड़ोसी रागिनी ने पूछा कि वे खेलते हैं क्या। मानवेंद्र जी ने कहा कि कभी खेलते थे, अब कुछ नियम फिर याद करने होंगे। वे साथ बैठे। रागिनी उन्हें किसी पद के कारण सुनने नहीं बैठी थी। बातचीत खेल से शुरू होकर शहर और दिनचर्या तक गई। मानवेंद्र जी ने अपने पुराने विद्यालय का छोटा किस्सा सुनाया और रागिनी ने अपने काम की बात कही। उन्हें अच्छा लगा कि परिचय दोनों दिशाओं से बन रहा था।
कुछ दिनों बाद समूह में बच्चों के लिए एक सामान्य पठन गतिविधि की बात आई। मानवेंद्र जी ने अपना अनुभव बताकर उपलब्ध समय में सहयोग का प्रस्ताव दिया। उन्होंने पूरा कार्यक्रम अपने पुराने तरीके से बदलने का आग्रह नहीं किया। नई जगह की व्यवस्था और जिम्मेदार लोग अलग थे। जो हिस्सा उनके समय और कौशल से मेल खाता था, उसी पर सहमति हुई। उन्हें लगा कि पुराने अनुभव का सम्मान उसे ज्यों का त्यों हर जगह लागू कराने में नहीं है। वह नई जरूरत सुनकर उचित योगदान देने में भी साथ आ सकता है।
कार्यक्रम के दिन कुछ बातें उनकी अपेक्षा से अलग रहीं। शोर हुआ, समय खिसका और एक योजना अधूरी रही। पहले की भूमिका में वे तुरंत निर्देश दे सकते थे। यहाँ उन्होंने संबंधित व्यक्ति से बात की और अपना सुझाव उचित जगह रखा। किसी ने माना, किसी ने अलग रास्ता चुना। उन्हें थोड़ा संकोच हुआ, फिर धीरे धीरे यह भी सहज लगा। नई पहचान में हर अनुभव के साथ सहमत हो जाना आवश्यक नहीं था। साथ ही हर असहमति को अपने पुराने जीवन की अवमानना मानना भी उनके लिए भारी पड़ता।
रागिनी एक शाम चाय लेकर आई तो विद्यालय की बात के अलावा उनकी पसंद की कहानियाँ पूछीं। मानवेंद्र जी ने कहा कि उन्हें पुरानी यात्राओं के छोटे नोट लिखना अच्छा लगता था। बहुत वर्षों से वह काम छूटा था। उन्होंने एक कॉपी निकाली और दो पन्ने पढ़कर सुनाए। उनमें कोई बड़ा पद नहीं था, केवल रास्ते के दृश्य और कुछ मजेदार घटनाएँ थीं। उन्हें लगा कि अपने बारे में बताने के लिए उनके पास उपलब्धियों से अलग भी बहुत सामग्री है। नई जगह उन्हें अपने उस हिस्से से फिर मिलवा रही थी।
महीने बीते तो नमस्ते के बाद कुछ लोग रुकने लगे। किसी को उनका नाम याद था, किसी को शतरंज का खेल और किसी को पढ़ी हुई कहानी। पुराने शहर का स्थान इससे समाप्त नहीं हुआ। मानवेंद्र जी वहाँ जाते तो परिचित गलियों में अब भी खुशी मिलती। वापस लौटकर नए घर के नीचे बैठना भी अपना लगने लगा था। उन्होंने अपने अतीत को छोटा नहीं किया, पर हर नए संबंध की शुरुआत उसी का प्रमाणपत्र दिखाकर करना जरूरी नहीं रहा। नई जगह में पहचान धीरे बनी और उसमें पुराना अनुभव, नई जिज्ञासा और सामान्य पड़ोसी होने की सहजता साथ रह सकी।