तस्वीर के बाद तीन रविवार: ईरा की साइकिल सच में बाहर आई

नए हेलमेट के साथ तस्वीर लेने के बाद ईरा ने साइकिल दीवार के पास लगा दी। अगले रविवार वह निकलने वाली थी। फिर बारिश की संभावना, देर तक चला काम और एक पारिवारिक कार्यक्रम बीच में आया। तीन सप्ताह बाद साइकिल उसी जगह थी। बत्तीस वर्ष की ईरा को बचपन की साइकिल वाली शामें याद थीं और वह फिर उस अनुभव के पास लौटना चाहती थी। उसे लगा था कि नई चीज आते ही आदत भी साथ आ जाएगी। अब हर छूटा रविवार उसकी इच्छा को थोड़ी शर्मिंदगी में बदल रहा था।
उसने मित्र से कहा कि शायद उसमें अनुशासन नहीं है। मित्र ने पूछा कि उसने शुरुआती सवारी के लिए जगह और समय तय किया है या केवल रविवार लिखा है। ईरा ने देखा कि घर से निकलते ही जिस रास्ते पर जाना सोच रही थी, उसे वहाँ की व्यस्तता और अपने अभ्यास को लेकर संकोच था। यह केवल आलस नहीं था। बहुत दिनों बाद लौटे कौशल के लिए उसे परिचित होने की जगह चाहिए थी। उसने उपलब्ध सुरक्षित अभ्यास स्थान, उपयुक्त साधन और जानकार व्यक्ति से शुरुआती सहायता की व्यवस्था देखी। अपने संकोच को अनदेखा करके किसी भी सड़क पर निकलना उसे जरूरी नहीं लगा।
पहली सुबह वह बहुत दूर नहीं गई। साथ आए प्रशिक्षित परिचित ने उसकी साइकिल की हालत और जरूरी तैयारी देखी। उसने थोड़ी देर अभ्यास किया और अपनी सुविधा के अनुसार रुकी। ईरा को पहले लगा कि इतनी छोटी कोशिश की क्या कहानी बनेगी। फिर उसने ध्यान दिया कि पूरे समय वह अगले फोटो के बारे में नहीं सोच रही थी। उसे चलने, रुकने और रास्ते पर ध्यान देने का पुराना अनुभव धीरे धीरे लौट रहा था। उस दिन का अच्छा हिस्सा दूरी नहीं था। वह घर में खड़ी इच्छा से बाहर निकलकर वास्तविक अभ्यास तक पहुँची थी।
अगले सप्ताह उसने दो छोटी सुबह चुनीं। एक दिन समय मिला, दूसरे दिन काम के कारण नहीं मिला। इस बार उसने साइकिल को अपनी पूरी आदत का फैसला नहीं बनाया। जो दिन छूटा, उसके बाद अगला उपलब्ध समय देखा। वह अपनी तैयारी और क्षमता के अनुसार रास्ता चुनती और जरूरत पड़ने पर सहायता लेती। उसे किसी दूसरे व्यक्ति की लंबी सवारी से अपनी शुरुआत की तुलना करना कम उपयोगी लगने लगा। मित्र अपने अनुभव साझा करते, मगर ईरा अपने समय और सुविधा का निर्णय स्वयं रखती।
एक सुबह पार्क के रास्ते पर परिचित बुजुर्ग मिले। उन्होंने अपनी पुरानी साइकिल यात्राओं का किस्सा सुनाया। ईरा ने महसूस किया कि अब तक वह शहर के कई हिस्से केवल बंद गाड़ी की खिड़की से देखती रही थी। खुले रास्ते का अनुभव अलग था, फिर भी उसने हर जरूरी यात्रा का साधन बदलने की घोषणा नहीं की। काम की दूरी, मौसम, रास्ते की सुविधा और साथ लाए सामान की जरूरत अलग होती थी। उसके लिए फिलहाल यह अपनी सुबह का एक चुना हुआ हिस्सा था। उसका आनंद तभी बना रह सकता था जब वह वास्तविक परिस्थिति से जुड़ा रहे।
साइकिल की सामान्य देखभाल भी उसके ध्यान में आई। पहले वह इस्तेमाल के बाद बस खड़ी कर देती थी। अब स्थिति देखना, सही जगह रखना और जरूरत हो तो जानकार से काम करवाना दिनचर्या का हिस्सा बना। उसने हर तकनीकी काम अपने आप सीख लेने की जल्दी नहीं की। जितना समझना जरूरी था, ठीक से पूछा। किसी दिन अभ्यास कम हुआ तो उस समय को व्यवस्था देखने में लगाया। उसे लगा कि रुचि निभाने में रोमांच वाले क्षणों के साथ साधारण तैयारी भी आती है। उसी तैयारी से अगली बार निकलना आसान होता है।
महीने के अंत में ईरा ने पहली तस्वीर फिर देखी। नया हेलमेट चमक रहा था और पीछे साइकिल बिल्कुल साफ थी। अब उस पर रोज के उपयोग के छोटे निशान थे। तस्वीर पहले जितनी नई नहीं लगती, मगर उसका अर्थ अधिक वास्तविक था। ईरा कई बार निकल चुकी थी, कुछ बार रुकी थी और कुछ सुबहें छूटी भी थीं। वह अपने अनुभव को किसी बड़ी उपलब्धि का नाम नहीं देना चाहती थी। उसे इतना अच्छा लगा कि रविवार की प्रतीक्षा में खड़ी चीज अब उसके सप्ताह में थोड़ी जगह पा चुकी है। एक सुबह वह बिना फोटो लिए लौटी और काम शुरू होने से पहले शांत बैठकर चाय पी। साइकिल दरवाजे के पास थी, अगली सुविधाजनक सुबह के लिए तैयार।