वैदिक प्रेरणा

दौड़ते कदम और बेंच का मोड़: ऋतिका ने पार्क की दूसरी सुबह सुनी

वैदिक प्रेरणा2026-10-22प्रकृति और नगर • कथा
दौड़ते कदम और बेंच का मोड़: ऋतिका ने पार्क की दूसरी सुबह सुनी
पार्क के दूसरे चक्कर में ऋतिका को फिर रुकना पड़ा। रास्ते के मोड़ पर चार लोग खड़े होकर बात कर रहे थे। उसने जल्दी से किनारा लिया और आगे निकल गई। इकतीस वर्ष की ऋतिका काम पर जाने से पहले थोड़ी दौड़ लगाती थी। समय कम था और बार बार गति रोकने से उसे खीझ होती थी। उस दिन उसने समूह में लिखा कि पार्क का रास्ता चलने दौड़ने के लिए है, लोगों को बीच में खड़े नहीं होना चाहिए। संदेश के नीचे सहमति आई, फिर किसी ने पूछा कि तेज दौड़ने वाले धीमे चलने वालों का भी ध्यान रखते हैं या नहीं। अगली सुबह ऋतिका ने वही लोग देखे। उनमें से हरिशंकर जी पास की बेंच पर बैठे थे। उसने सामान्य नमस्ते के बाद अपनी कठिनाई कही। उन्होंने बताया कि उस मोड़ के पास रास्ता समतल लगता है और आगे कुछ हिस्सा असुविधाजनक है। समूह बात करते हुए वहीं रुक जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि अचानक बहुत पास से दौड़कर निकलने पर उन्हें डर लगता है। ऋतिका को पहली बार दूसरे व्यक्ति का वही मोड़ अलग अनुभव से दिखाई दिया। उसे खुला रास्ता चाहिए था, उन्हें चलने में सहज जगह और रुकने का सुरक्षित स्थान। दोनों की बातचीत में किसी एक को पार्क का असली उपयोगकर्ता घोषित नहीं किया गया। हरिशंकर जी ने माना कि बातचीत के लिए पूरा रास्ता घेरना ठीक नहीं। ऋतिका ने माना कि अपनी गति को बाकी लोगों के लिए बाध्यकारी मानकर पास से निकल जाना भी समस्या है। उन्होंने पार्क की देखभाल करने वाले लोगों तक खराब हिस्से की बात पहुँचाई। किस जगह सुधार संभव है और किन बातों के लिए संबंधित प्रबंधन की सहमति चाहिए, यह समझा गया। अपने स्तर पर रास्ता बदल देना या कोई स्थायी अवरोध खड़ा करना समाधान नहीं चुना गया। कुछ दिनों तक उन्होंने उपलब्ध जगह में छोटा क्रम आजमाया। बातचीत करने वाले लोग बेंच के पास खुली जगह में रुकते। ऋतिका मोड़ पर पहले से गति कम रखती और जगह मिलने पर आगे बढ़ती। बाकी नियमित लोगों से भी बात हुई। हर व्यक्ति की जरूरत एक जैसी नहीं थी। किसी को धीरे चलना था, किसी को थोड़ी कसरत और किसी को केवल बाहर बैठना अच्छा लगता था। एक समूह ने संगीत के साथ अभ्यास का समय बदलकर देखा ताकि पास बैठने वालों को बात करने में कठिनाई कम हो। ये निर्णय सबको एक जैसा बनाने के लिए नहीं, अलग उपयोग साथ रह सकें इसलिए थे। ऋतिका को फिर भी कभी रुकना पड़ता था। पार्क कोई खाली अभ्यास पटरी नहीं बन गया था। पहले वह हर बाधा को दूसरे लोगों की लापरवाही मान लेती थी। अब जहाँ वास्तव में असुविधा थी, उसे साफ कह सकती थी और जहाँ साझा जगह की सामान्य सीमा थी, उसे स्वीकार कर सकती थी। हरिशंकर जी भी अपने साथियों को रास्ता खुला रखने की बात याद दिलाते। दोनों ने एक दूसरे की निगरानी का जिम्मा नहीं लिया। परिचय बढ़ने से सामान्य बात कहने का स्वर बदल गया था। एक रविवार पार्क में छोटा सामूहिक कार्यक्रम था। ऋतिका को अभ्यास का दूसरा समय चुनना पड़ा। उसने आयोजकों से वापसी में सामान और रास्ता साफ करने की जानकारी पूछी। यह पहले तय था तो उसे बदलाव समझने में सुविधा हुई। अगले दिन रास्ता सामान्य मिला। उसने समूह में उसकी पुष्टि लिखी और साथ ही खराब हिस्से की लंबित बात याद दिलाई। किसी दिन असुविधा उठाने के बाद बाकी जरूरतों को भूल जाना जरूरी नहीं था। साझा स्थान में समय पर सूचना और तय काम पूरा होना दोनों भरोसा बनाते थे। महीने के अंत में ऋतिका को अपनी शुरुआती शिकायत याद आई। उसमें उसकी परेशानी सही थी, पर दूसरों की जगह लगभग गायब थी। अब वह दौड़ते समय कई चेहरों को पहचानती थी। कोई हाथ उठाकर नमस्ते करता और कोई थोड़ा हटकर रास्ता देता। वह भी मोड़ पर धीरे होती और जगह देखकर आगे बढ़ती। पार्क का आकार नहीं बढ़ा था, लेकिन उसके उपयोग का नक्शा सबकी बात से थोड़ा साफ हुआ था। ऋतिका को अपनी सुबह अब भी प्रिय थी। बस उसमें अपनी गति के साथ उन लोगों का समय भी दिखाई देता था जो उसी हरियाली में किसी दूसरे कारण से आते थे।

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