हर देरी पर वही छूटी ट्रेन: ईशान और रुचिका की आज की बात

घड़ी देखते हुए ईशान ने कहा कि फिर देर हो रही है, ठीक वैसे ही जैसे उस यात्रा में ट्रेन छूट गई थी। पत्नी रुचिका ने अलमारी बंद की और उत्तर देने के बजाय बैठ गई। ट्रेन छूटने की घटना दो वर्ष पुरानी थी। उस दिन उसकी ओर से तैयारी देर हुई थी और दोनों को परेशानी उठानी पड़ी थी। उसने अपनी गलती मानी थी, आगे यात्रा का समय पहले रखने पर बात हुई थी और तब से कई यात्राएँ समय पर हुई थीं। फिर भी घर से निकलते समय वह पुरानी घटना अक्सर उसके नाम के साथ खड़ी हो जाती थी।
आज भी रुचिका पाँच मिनट देर थी। उसने इस बात से इनकार नहीं किया। उसकी चिढ़ वर्तमान देरी सुनने पर नहीं थी। उसे लगता था कि किसी एक गलती के बाद उसके हर सामान्य प्रयास का हिसाब उसी पहचान से शुरू होता है। ईशान को लगा कि वह समय की जरूरी बात कहने से रोक रही है। दोनों एक ही वाक्य में अलग समस्या सुन रहे थे। रुचिका ने कहा कि आज की देरी पर जरूर बात होगी, लेकिन पिछली बार की चर्चा हर बार फिर खोलना उसे ठीक नहीं लग रहा।
वे उस शाम किसी जरूरी यात्रा पर नहीं, मित्रों के घर भोजन पर जा रहे थे। उन्होंने देर की सूचना दी और निकलने से पहले थोड़ी बात की। ईशान ने बताया कि ट्रेन छूटने की परेशानी उसे अब भी याद है। उसे पहले से समय बिगड़ता दिखे तो उसी दिन की घबराहट लौट आती है। रुचिका ने पहली बार उस बात को केवल ताना मानने के बजाय सुना। फिर उसने कहा कि डर बताना और हर बार उसे उसी पुरानी गलती का व्यक्ति बना देना अलग अनुभव देते हैं। वह चाहती थी कि बदलाव के बाद की कई सफल तैयारियाँ भी दिखाई दें।
अगले दिन उन्होंने दोनों बातें अलग कीं। वर्तमान में समय का ध्यान कैसे रखा जाए और पुरानी घटना में कौन सा हिस्सा अब भी अनकहा है। ईशान को लगा था कि रुचिका ने केवल जल्दी से माफी कहकर बात बंद कर दी थी। रुचिका को लगा था कि समाधान पर सहमति हो जाने से चर्चा पूरी हो गई। उन्होंने उस दिन की असुविधा फिर सुनी, बिना दोष की नई सूची खोले। इससे सारी चिढ़ तुरंत समाप्त नहीं हुई। फिर भी ईशान साफ कह पाया कि आगे उसे किस संकेत पर चिंता होती है और रुचिका बता सकी कि समय का ध्यान रखने के उसके प्रयास क्या रहे हैं।
घर से निकलने का नया तरीका कोई दंड नहीं बना। दोनों अपना सामान पहले देखते और निकलने का वास्तविक समय तय करते। जिस दिन ईशान अपने काम के कारण देर हुआ, रुचिका का मन हुआ कि पुराना हिसाब लौटाए। उसने इसके बजाय आज की परेशानी बताई। वह यह साबित नहीं करना चाहती थी कि गलती केवल एक व्यक्ति की नहीं होती। उसे सामने वाले से भी वही व्यवहार चाहिए था जो स्वयं अपनाने की कोशिश कर रही थी। ईशान ने देर मानी और आगे की सूचना दी। उस दिन की बात उसी दिन के काम तक रही।
एक महीने बाद किसी यात्रा की तैयारी में ईशान के मुँह से पुराना वाक्य फिर निकलने लगा। वह बीच में रुका। उसने कहा कि उसे समय कम लग रहा है और वह चिंतित है। रुचिका ने बताया कि उसका सामान तैयार है, केवल एक फोन करना है। वे समय से निकल गए। यह कोई ऐसी कहानी नहीं बनी जिसमें एक साफ बातचीत से पुरानी आदत हमेशा के लिए मिट गई हो। कुछ बार याद दिलाना पड़ा। फर्क इतना था कि अब वे पहचान सकते थे कि वर्तमान समस्या पर काम हो रहा है या पुराने दोष को फिर रिश्ते के बीच रखा जा रहा है।
रुचिका ने उस यात्रा की पुरानी तस्वीर नहीं हटाई जिसमें वे बाद की बस से गए थे। उसमें परेशानी की याद भी थी और रास्ते की एक अच्छी शाम भी। उसके लिए महत्वपूर्ण यह था कि गलती की जिम्मेदारी लेने के बाद सुधार को भी जीवन में जगह मिले। ईशान को भी अपनी चिंता कहने के लिए हर बार वही घटना सुनाने की जरूरत कम हुई। दोनों समय के मामले में पूरी तरह समान नहीं बने थे। बस अब घड़ी देखते हुए आज की बात कही जा सकती थी। बीती घटना अनुभव का हिस्सा रही, किसी व्यक्ति का हर बार दोहराया जाने वाला पूरा परिचय नहीं।