वैदिक प्रेरणा

अभी कविता नहीं सुनानी: रचना ने निहाल की बात मानी

वैदिक प्रेरणा2026-10-22घर और संवाद • कथा
अभी कविता नहीं सुनानी: रचना ने निहाल की बात मानी
मेहमान आते ही रचना ने बेटे को आवाज दी कि नई कविता सुनाओ। आठ वर्ष का निहाल दरवाजे के पास आकर रुक गया। उसने कहा कि अभी नहीं सुनानी। रचना ने मुस्कराते हुए फिर आग्रह किया। मेहमानों ने भी उत्साह बढ़ाया। बच्चा पीछे हट गया तो रचना को लगा कि वह सबके सामने उनकी बात नहीं मान रहा। वह उसे कमरे से बुलाने गईं। निहाल ने धीरे से कहा कि कविता उसे आती है, लेकिन अभी सबके सामने बोलने का मन नहीं है। रचना के पास तुरंत उत्तर था कि इतनी अच्छी चीज सीखी है तो दिखाने में क्या परेशानी है। उस शाम निहाल ने आखिर कविता सुना दी। शब्द ठीक थे, आवाज धीमी थी और वह समाप्त होते ही अपने कमरे में चला गया। सबने ताली बजाई। रचना खुश होना चाहती थीं, पर बेटे का चेहरा याद आता रहा। वह उसकी सीख पर गर्व करती थीं। उन्हें अपने प्रिय लोगों को उसका नया काम दिखाना अच्छा लगता था। फिर भी उस गर्व में बच्चे की इच्छा कहाँ थी, यह प्रश्न पहली बार सामने आया। उन्होंने रात को उससे पूछा कि उसे क्या असुविधा हुई थी। निहाल ने कहा कि आते ही सब देख रहे थे और उसे ऐसा लगा जैसे अचानक परीक्षा शुरू हो गई हो। रचना ने अगले दिन उसे समझाने के बजाय अपनी ओर की बात कही। उन्हें अच्छा लगता है कि वह सीख रहा है, लेकिन पिछली शाम उन्होंने उसके मना करने के बाद भी दबाव डाला। निहाल ने पूछा कि अगली बार मना कर सकता है या नहीं। रचना ने कहा कि नमस्ते और सामान्य बातचीत रह सकती है, मगर हर बार गीत, कविता या पूरा अभ्यास दिखाना जरूरी नहीं होगा। बच्चे के पास अपनी सीमा बताने का छोटा तरीका होना चाहिए था। रचना को भी बिना संबंध बिगाड़े मेहमानों से यह बात कहने का अभ्यास करना था। अगली बार उनकी मित्र आईं तो उन्होंने निहाल के चित्र देखने की इच्छा जताई। रचना ने पहले उससे पूछा कि क्या वह अपना फोल्डर दिखाना चाहता है। उसने दो चित्र लाकर दिए और बाकी बाद में कह दिया। मित्र ने वे दो चित्र देखे, उनके बारे में प्रश्न पूछा और फोल्डर वापस कर दिया। बातचीत बिना किसी नाराजगी के आगे बढ़ गई। रचना को लगा था कि सीमा रखने से अतिथि को बुरा लगेगा। उस दिन ऐसा नहीं हुआ। फिर भी उन्होंने यह मानकर तैयारी नहीं छोड़ी कि हर व्यक्ति उतनी ही सहजता से बात स्वीकार करेगा। एक रिश्तेदार ने बाद में फिर कविता सुनाने को कहा और निहाल के मना करने पर उसे शर्मीला बताया। रचना ने धीरे से कहा कि वह अभी नहीं सुनाना चाहता, किसी और समय होगा। उन्होंने बच्चे से उसकी इच्छा का लंबा कारण सबके सामने नहीं माँगा। बाद में उससे पूछा कि क्या वह उस रिश्तेदार से बात करना चाहता है या कुछ देर अपने काम में रहेगा। निहाल ने थोड़ी देर बाद स्वयं अपनी नई किताब दिखाई। मिलने का उसका तरीका उस शाम कविता सुनाना नहीं था। उसे अपना रूप चुनने देने से परिचय का रास्ता बंद नहीं हुआ था। कुछ सप्ताह बाद स्कूल में प्रस्तुति थी। निहाल ने घर में कई बार अभ्यास किया और चाहता था कि रचना ध्यान से सुनें। उन्हें समझ आया कि हर बार प्रदर्शन से मना करने और किसी तय अवसर के लिए अभ्यास करने में फर्क है। जरूरत के अनुसार सहारा दिया जा सकता है, बिना हर मुलाकात को मंच बनाए। उन्होंने समय रखा, उसकी तैयारी सुनी और जहाँ सहायता चाहिए थी, दी। प्रस्तुति का चित्र दूसरों को भेजने से पहले भी उससे पूछा। बच्चे की छोटी इच्छा को सुनना उसका सारा निर्णय उसी पर छोड़ देना नहीं था; यह रोज की बातचीत में सम्मान का हिस्सा था। रचना का अपने बेटे पर गर्व कम नहीं हुआ। बस वह गर्व तुरंत सार्वजनिक प्रमाण माँगने वाला नहीं रहा। मेहमान आने पर घर में सामान्य चहल पहल रहती, बच्चा कभी साथ बैठता और कभी अपने कमरे में काम करता। नई कविता सुनाने का दिन भी आता, लेकिन तब उसकी आँखों में तैयारी की चमक होती। रचना के लिए वह आवाज पहले की धीमी मजबूर आवाज से अलग थी। उन्होंने जाना कि सीखी हुई चीज की खुशी बचाने के लिए कभी मंच तैयार करना पड़ता है और कभी उसे अभी बंद रहने देना भी जरूरी होता है।

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