रटने से समझने तक: रिया का अधूरा सहयोग

रिया को सहयोग की परिभाषा पूरी याद थी। वह बिना रुके बोल सकती थी कि मिलकर काम करने से उद्देश्य पूरा होता है। परीक्षा में यही उत्तर लिखकर अच्छे अंक भी मिले थे। लेकिन जब विद्यालय की प्रदर्शनी के लिए समूह बनाया गया, उसने हर काम अपने हाथ में ले लिया। उसे लगा कि बाकी लोग धीरे करेंगे और उसका नमूना खराब हो जाएगा। दूसरे सदस्य पहले चुप हुए, फिर धीरे धीरे काम से अलग होने लगे।
चौदह वर्ष की रिया पढ़ाई में अच्छी थी। उसे तैयार उत्तर और स्पष्ट परिणाम पसंद थे। समूह में कोई अलग तरीका सुझाता तो उसे समय की बर्बादी लगती। इस बार विषय था मोहल्ले की उपयोगी जगहों का परिचय। किसी को पुस्तकालय दिखाना था, किसी को खेल का मैदान और किसी को छोटी दुकानों का काम। रिया ने घर जाकर लगभग पूरा चार्ट बना दिया। अगले दिन वह खुश थी कि उसने सबकी मदद कर दी है।
साथी समीर ने चार्ट देखा और पूछा कि उसमें उसके बनाए चित्र कहाँ हैं। रिया ने कहा कि पुराने चित्र रंग से मेल नहीं खाते थे, इसलिए उसने नए बना दिए। जोया ने बताया कि उसने पड़ोस की सिलाई वाली महिला से बात की थी; उसका अनुभव भी कहीं नहीं था। रिया को लगा कि सब प्रशंसा के बजाय शिकायत कर रहे हैं। उसने चार्ट मेज पर रखा और कहा कि फिर पूरा काम वे लोग ही कर लें।
अध्यापक ने झगड़ा सुना तो तुरंत सही और गलत घोषित नहीं किया। उन्होंने रिया से पूछा कि प्रदर्शनी में समूह के चारों लोग क्या समझाएँगे। रिया हर हिस्से का उत्तर देने लगी। बाकी सदस्यों से पूछा गया तो कुछ बातों की जानकारी केवल उन्हीं के पास थी, जो चार्ट पर नहीं आई थी। अध्यापक ने सहयोग की परिभाषा नहीं दोहराई। उन्होंने केवल पूछा कि काम एक व्यक्ति का हो गया तो समूह ने साथ क्या सीखा।
रिया उस प्रश्न पर रुकी। उसे लगा था कि सुंदर चार्ट ही पूरा लक्ष्य है। उसने साथी लोगों की भूमिका को केवल सहायता समझा था। शाम को उसने अपनी कॉपी में याद की हुई परिभाषा पढ़ी। शब्द अब भी सही थे, लेकिन उनके नीचे अपना व्यवहार रखकर देखा तो अंतर दिखाई दिया। मिलकर काम करना केवल दूसरों की धीमी गति सहना नहीं था। उसमें उनके विचार और अनुभव को परिणाम में वास्तविक जगह देना भी आता था।
अगली बैठक में उसने माफी माँगी और पूछा कि कौन सा हिस्सा कैसे रखा जाए। सब तुरंत उत्साहित नहीं हुए। समीर को डर था कि उसके चित्र फिर हट जाएँगे। जोया चाहती थी कि साक्षात्कार की बात उसके शब्दों में आए। उन्होंने पहले छोटा नमूना बनाया और साथ देखा। कुछ चित्र नए बने, कुछ पुराने रहे। रिया ने शीर्षकों का काम लिया। इस बार निर्णय से पहले बात हुई और बदलने का कारण सबको पता था।
प्रदर्शनी में उनका चार्ट सबसे चमकीला नहीं था। फिर भी चारों अपने हिस्से को समझा सकते थे। किसी दर्शक ने जोया से प्रश्न किया तो रिया बीच में उत्तर देने लगी, फिर रुक गई। जोया ने अपनी बात कही और जरूरत पर साथी की मदद ली। रिया को उस क्षण परिभाषा का अर्थ अधिक साफ लगा। उसके पास केवल बोलने वाला वाक्य नहीं, अनुभव से जुड़ा उदाहरण भी था।
बाद में उसने दूसरे पाठ पढ़ते समय एक नया प्रश्न जोड़ लिया कि यह बात वास्तविक स्थिति में कैसी दिखेगी। हर ज्ञान को तुरंत किसी गतिविधि में बदलना संभव नहीं था, मगर उदाहरण खोजने से उसकी समझ की कमी सामने आती थी। याद करना उसके लिए बेकार नहीं हुआ। जरूरी शब्द और क्रम उसे अब भी याद रखने थे। फर्क यह था कि याद उत्तर के बाद सोच समाप्त नहीं होती थी। वह अर्थ जाँचने की शुरुआत बन सकता था।