कक्षा का सबसे शांत प्रश्न: पहाड़ की चुप्पी में क्या है

कविता का पाठ समाप्त हुआ तो बच्चों ने अपनी कॉपियाँ खोल लीं। अध्यापिका ने चार प्रश्न लिखवाए और उत्तर समझाए। अंतिम पंक्ति में पहाड़ की चुप्पी का वर्णन था। बारह वर्ष की पाखी उसी पंक्ति पर उँगली रखे बैठी थी। बाकी बच्चे उत्तर लिख रहे थे। वह जानना चाहती थी कि पहाड़ चुप कैसे हो सकता है, जब वह बोलता ही नहीं। प्रश्न उसे इतना सरल लगा कि उसने हाथ नहीं उठाया।
पाखी सामान्यतः कक्षा में कम बोलती थी। वह सुनती, लिखती और घर जाकर अपनी छोटी बहन को पाठ पढ़ाती। उस दिन बहन को कविता समझाने की कल्पना की तो कठिनाई सामने आई। उत्तर याद था कि चुप्पी से शांति का भाव आता है। लेकिन यह वाक्य बोल देने से उसका अपना प्रश्न समाप्त नहीं हो रहा था। उसे लग रहा था कि शायद सभी समझ गए हैं और केवल वही किसी छोटी बात में अटकी है।
कक्षा समाप्त होने से पहले अध्यापिका यामिनी ने पूछा कि कोई बात बाकी है क्या। दो बच्चों ने अगले दिन के काम के बारे में पूछा। पाखी की उँगली फिर उसी पंक्ति पर गई। उसने धीरे से हाथ उठाया और अपना प्रश्न कहा। पीछे से किसी की हँसी सुनाई दी। यामिनी ने तुरंत नया उत्तर बोलने के बजाय सबको पंक्ति दोबारा पढ़ने को कहा। उन्होंने पूछा कि पहाड़ की चुप्पी सुनकर उनके मन में कौन सा दृश्य आता है।
एक बच्चे को सुबह का खाली रास्ता याद आया। दूसरे को छुट्टी के दिन की छत। पाखी ने कहा कि उसे ऊँची जगह से नीचे देखते हुए छोटे घरों का दृश्य लगता है। उसे स्वयं आश्चर्य हुआ कि एक प्रश्न से इतने अलग चित्र निकल सकते हैं। यामिनी ने बताया कि कविता में कभी वस्तुओं के माध्यम से मन का अनुभव सामने आता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि अलग पाठक उस अनुभव को अलग तरह से भी देख सकते हैं।
पाखी ने पूछा कि फिर परीक्षा में एक ही उत्तर क्यों लिखा जाता है। यह दूसरा प्रश्न पहले से अधिक कठिन था। यामिनी ने माना कि परीक्षा का उत्तर सीमित हो सकता है और पढ़ने का अनुभव उससे बड़ा। उन्होंने दोनों को दुश्मन नहीं बनाया। बच्चों को जरूरी उत्तर लिखवाया, फिर अपनी अनुभूति के दो वाक्य जोड़ने का समय दिया। कोई भी मनमाना वाक्य सही नहीं माना गया; उसे कविता की पंक्ति से संबंध भी दिखाना था।
घर पहुँचकर पाखी ने बहन को कविता सुनाई। इस बार केवल कॉपी का उत्तर नहीं पढ़ा। उसने पूछा कि पहाड़ देखकर उसे क्या याद आता है। बहन ने छुट्टियों की एक तस्वीर बताई। पाखी को लगा कि वह पढ़ाते समय भी प्रश्न जल्दी बंद कर देती थी। अब उसने बहन का उत्तर पूरा सुना। अपने प्रश्न पूछने की जगह मिलने से उसे दूसरे की जिज्ञासा के लिए भी थोड़ा धैर्य मिला।
अगले सप्ताह यामिनी ने कक्षा में एक छोटी पर्ची रखी। जो बात बोलकर पूछना कठिन लगे, बच्चे लिख सकते थे। कुछ पर्चियों में वर्तनी के प्रश्न थे, कुछ में पाठ की उलझन। हर प्रश्न को लंबी चर्चा नहीं मिली, मगर उन्हें बेकार कहकर हटाया भी नहीं गया। पाखी अब भी हर दिन सबसे पहले हाथ नहीं उठाती थी। जरूरी बदलाव यह था कि चुप रहने को उसने समझ जाने का प्रमाण मानना छोड़ दिया था।
कुछ दिनों बाद एक साथी ने पाखी से कहा कि उसके प्रश्न के बाद उसे भी कविता थोड़ी अलग लगी। पाखी खुश हुई, लेकिन प्रश्न पूछने का कारण केवल प्रशंसा पाना नहीं रहा। उसे पता चला कि समझ की छोटी अटकन पहचानना सीखने का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर सरल दिखती बात वास्तव में सरल नहीं होती। शांत स्वर में पूछा गया प्रश्न भी पूरे पाठ के लिए नई खिड़की खोल सकता है, यदि उसे सुनने की जगह मिले।