वैदिक प्रेरणा

जूनियर की उपयोगी सलाह: अनुभव के साथ नई नजर भी

वैदिक प्रेरणा2026-10-22काम और आत्मसम्मान • कथा
जूनियर की उपयोगी सलाह: अनुभव के साथ नई नजर भी
पंजीकरण की मेज पर भीड़ बढ़ रही थी और मैं बार बार वही निर्देश दोहरा रही थी। नाम पहले लिखिए, फिर शुल्क की पर्ची लीजिए, उसके बाद कक्ष संख्या देखिए। कला कार्यशाला का यह तीसरा वर्ष था। मुझे व्यवस्था का अनुभव था और उसी अनुभव पर गर्व भी। मेरे पास खड़ी नई सहायक तनीषा ने धीरे से कहा कि मेजों के नाम बदल दिए जाएँ तो शायद लोगों को आसानी हो। मैंने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया कि यह तरीका वर्षों से चल रहा है। मेरा नाम वंदना है। मैं नगर के एक सांस्कृतिक केंद्र में कार्यक्रम सँभालती हूँ। उस दिन बच्चे, अभिभावक और कुछ वयस्क प्रतिभागी अलग अलग समय पर आ रहे थे। मेजों पर केवल एक, दो और तीन लिखा था। हमें पता था कि किस संख्या का अर्थ क्या है। बाहर से आने वाले व्यक्ति को यह जानकारी नहीं थी। फिर भी हर प्रश्न सुनकर मुझे लगता कि लोग सामने लगा बोर्ड पढ़ना नहीं चाहते। मैं व्यवस्था के बजाय लोगों की कमी खोज रही थी। तनीषा ने फिर कहा कि पहली मेज पर नाम लिखवाएँ, दूसरी पर पर्ची और तीसरी पर कक्ष जानकारी लिख सकते हैं। उसके पास एक छोटा कागज था जिस पर उसने नमूना बनाया था। मैंने कहा कि अभी समय नहीं है। सच यह था कि समय से अधिक मेरे अहंकार को कठिनाई थी। जिस लड़की को मैंने काम समझाया था, वही मुझे सुधार सुझा रही थी। उसके सुझाव में अपने अनुभव के अपमान की आवाज मैं स्वयं जोड़ रही थी। कुछ देर बाद एक बुजुर्ग प्रतिभागी गलत पंक्ति में तीसरी बार खड़े मिले। उन्हें चित्रकला की कक्षा करनी थी। उन्होंने संकोच से पूछा कि क्या हर मेज पर फिर नाम लिखना होगा। उस क्षण मुझे अपनी परिचित व्यवस्था बाहर से दिखाई दी। मैं उनके स्थान पर होती तो मुझे भी क्रम समझ नहीं आता। तनीषा पास खड़ी थी। उसने कुछ नहीं कहा। मैंने उससे वही नमूना फिर माँगा जिसे थोड़ी देर पहले टाल दिया था। हमने जल्दी में पूरा ढाँचा नहीं बदला। पहले एक साफ कागज लगाया और एक आने वाले व्यक्ति से पूछा कि उसे आगे कहाँ जाना समझ में आ रहा है या नहीं। उसके उत्तर से दो शब्द बदले। फिर तीनों मेजों पर काम के स्पष्ट नाम रखे गए। संख्या भी बनी रही ताकि पुराने कर्मचारी भ्रमित न हों। बदलाव छोटा था और कुछ मिनटों में हो गया। उसके बाद प्रश्न पूरी तरह बंद नहीं हुए, लेकिन गलत पंक्ति में खड़े लोग कम होने लगे। दोपहर को मैंने तनीषा से कहा कि उसकी सलाह उपयोगी थी। वह मुस्कराई, पर बोली कि पहले उसे लगा अब फिर कुछ नहीं कहेगी। मुझे यह सुनकर पछतावा हुआ। मैंने सोचा था कि केवल एक सुझाव टाला है। उसके लिए वह संकेत हो सकता था कि यहाँ बोलने की जगह नहीं है। मैंने अपनी पहली प्रतिक्रिया स्वीकार की। साथ ही उसे यह भरोसा केवल शब्दों से नहीं दे सकती थी कि आगे हर बात सुनी जाएगी। अगली बार मुझे व्यवहार में जगह बनानी थी। कुछ सप्ताह बाद उसने दूसरे कार्यक्रम में एक और बदलाव सुझाया। इस बार उसका सुझाव पूरा उपयोगी नहीं था। अलग आयु समूहों की जरूरत उसमें छूट रही थी। मैंने कारण समझाया और पूछा कि उसे कैसे बदला जा सकता है। हम दोनों ने नया प्रारूप बनाया। मुझे महत्वपूर्ण अंतर समझ आया। जूनियर की सलाह सुनना हर बात मान लेना नहीं है। उसे योग्यता और वास्तविक स्थिति के आधार पर देखना है, पद के आधार पर पहले ही खारिज नहीं करना। मैंने टीम की छोटी बैठकों में एक प्रश्न जोड़ दिया कि नए आने वाले व्यक्ति को कहाँ कठिनाई हो सकती है। जिन लोगों को सब कुछ परिचित था, उनके उत्तर अलग होते। नए सहायक कई उलझनें पहले देख लेते। पुराना अनुभव और नई नजर साथ आने पर व्यवस्था अधिक स्पष्ट बनी। किसी एक को सब जानने वाला घोषित करना काम के लिए उपयोगी नहीं था। मुझे अपना महत्व बनाए रखने के लिए दूसरों की उपयोगिता घटाने की आवश्यकता नहीं थी। आज भी केंद्र में वे तीन सरल बोर्ड रखे हैं। उन्हें देखकर मुझे तनीषा का छोटा कागज याद आता है। अनुभव ने मुझे बहुत कुछ सिखाया था, पर उसी के कारण कुछ कठिनाइयाँ दिखाई देना बंद हो गई थीं। एक नए व्यक्ति की नजर ने वह हिस्सा खोला। अच्छा वरिष्ठ होना मेरे लिए अब केवल निर्देश देना नहीं है। किसी छोटे पद वाले की समझ में अपने काम को बेहतर करने की संभावना पहचानना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

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