काम बाँटने का विवेक: नूपुर की मेज का पहाड़

मोहल्ले की पत्रिका छपने में तीन दिन बचे थे और संपादक नूपुर की मेज पर कागजों का पहाड़ था। कविताओं की जाँच, चित्रों की अनुमति, नामों का क्रम और छपाई की बातचीत सब उसी के पास था। समिति के चार सदस्य मदद करने आते, लेकिन लौटते समय उनके हाथ लगभग खाली रहते। नूपुर कहती कि वह स्वयं जल्दी कर लेगी। रात को वही शिकायत करती कि कोई जिम्मेदारी नहीं लेता।
पत्रिका छोटी थी, पर उसके लिए महत्वपूर्ण थी। कई लोगों का पहला लेख उसमें छपना था। बच्चों के चित्र भी आए थे और बुजुर्गों की स्मृतियाँ भी। नूपुर नहीं चाहती थी कि किसी का नाम गलत हो या काम अधूरा दिखे। पिछली बार एक पन्ना देर से मिला था, तब से उसने हर छोटी जिम्मेदारी अपने पास रख ली थी। सावधानी धीरे धीरे नियंत्रण बन गई थी। उसे अंतर दिखाई नहीं दे रहा था।
एक शाम समिति की सदस्य अदिति ने पूछा कि वह किस हिस्से की जिम्मेदारी ले सकती है। नूपुर ने उसे केवल लिफाफे गिनने को कहा। अदिति ने गिनती की और चुप बैठ गई। बाद में पता चला कि वह अपने कार्यालय में रोज बड़े दस्तावेजों की जाँच करती है। नूपुर को आश्चर्य हुआ। उसने कभी पूछा ही नहीं था कि साथियों का अनुभव क्या है। मदद माँगते समय वह लोगों को उपलब्ध हाथ मानती थी, अलग कौशल वाले व्यक्ति नहीं।
अगले दिन बैठक में नूपुर ने अपनी कठिनाई बताई। उसने यह नहीं कहा कि सब कुछ अब दूसरों को करना होगा। पहले बचा काम देखा गया। अदिति नाम और शीर्षक जाँच सकती थी। समीर छपाई वाले से तय बातों का लिखित मिलान कर सकता था। चित्रों के चयन में रुचि रखने वाली फरहा अनुमति और आकार की जानकारी जुटाती। अंतिम संपादन नूपुर के पास रहा, लेकिन उसके आसपास स्पष्ट जिम्मेदारियों की जगह बनी।
शुरुआत में फिर उलझन हुई। नूपुर हर दस मिनट में अदिति की सूची खोलकर बदलाव कर देती। अदिति को समझ नहीं आता कि कौन सा संस्करण अंतिम है। उसने साफ कहा कि जिम्मेदारी मिली है तो काम का एक निश्चित समय और तरीका भी चाहिए। नूपुर को यह सुनना कठिन लगा। उसे नियंत्रण छूटता महसूस हुआ। फिर उन्होंने तय किया कि जाँच का समय होगा और बीच में जरूरी प्रश्न अलग लिखे जाएँगे। भरोसा केवल जिम्मेदारी बोलकर देने से नहीं बनता था।
समीर ने छपाई की तारीख में अंतर पकड़ा। नूपुर को लगा कि वह पहले ही सब तय कर चुकी है। पुराने संदेश देखने पर पता चला कि कागज मिलने की तारीख और तैयार प्रतियाँ मिलने की तारीख अलग थीं। यदि समीर केवल उसका निर्देश आगे भेज देता तो गलती बची रहती। अब समय पर बात हुई और योजना बदली गई। नूपुर ने पहली बार महसूस किया कि दूसरे को समझ के साथ काम देना केवल अपना बोझ कम करना नहीं, काम को बेहतर देखना भी है।
फरहा ने एक चित्र की अनुमति अधूरी पाई। उसे वह चित्र बहुत पसंद था, फिर भी उसने छापने की जल्दी नहीं की। समिति ने संबंधित व्यक्ति से स्पष्ट उत्तर आने तक दूसरा चित्र रखने का निर्णय लिया। नूपुर को राहत हुई कि उसकी सावधानी केवल उसी के भीतर नहीं है। साथी भी काम की गरिमा समझ सकते हैं, यदि उन्हें संदर्भ और निर्णय की जगह मिले। हर जिम्मेदारी का अर्थ केवल तय बटन दबाना नहीं था।
पत्रिका समय पर तैयार हुई, मगर एक शीर्षक में छोटी त्रुटि फिर भी रह गई। नूपुर का मन हुआ कि कह दे, मैंने किया होता तो ऐसा नहीं होता। फिर उसे पिछले संस्करण की अपनी गलतियाँ याद आईं। उन्होंने पाठक को सुधार बताया और अगली बार की जाँच में एक चरण जोड़ा। सामूहिक काम में गलती आने से जिम्मेदारी बाँटना गलत नहीं हो जाता। जरूरी यह था कि उसे मिलकर देखा जाए, किसी एक को शर्मिंदा करके नहीं।
लोकार्पण के दिन नूपुर पहली बार कार्यक्रम शुरू होने से पहले आराम से बैठी थी। उसके पास काम अब भी था, लेकिन वह अकेली दीवार नहीं बनी हुई थी जिसके पीछे सब अटक जाए। उसने साथियों के नाम लिए और उनके वास्तविक योगदान बताए। घर लौटते समय उसे समझ आया कि काम बाँटने का विवेक केवल सूची बनाने में नहीं है। सही व्यक्ति से बात करना, सीमा स्पष्ट करना और उसे अपने हिस्से का निर्णय लेने देना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।