उत्तर देने से पहले सुनना: दिशा की बात अधूरी रह गई थी

दिशा ने उस शाम केवल इतना कहा था कि आज का दिन बहुत कठिन रहा। मैंने तुरंत पूछा कि किसने क्या कहा। फिर उसके उत्तर पूरा करने से पहले ही समझाने लगा कि उसे अपने प्रबंधक से कैसे बात करनी चाहिए। मेरे पास तीन उपाय थे, एक तैयार संदेश था और यह विश्वास भी कि मैं उसकी मदद कर रहा हूँ। वह चुप हुई तो मैंने समझा कि शायद मेरी बात मान गई है।
कुछ देर बाद वह बालकनी में चली गई। मैं पीछे गया और पूछा कि अब भी उदास क्यों हो। उसने कहा कि उसे अभी कोई तैयार उत्तर नहीं चाहिए था। मैं चिढ़ गया। जब समस्या है तो समाधान के बारे में बात करना गलत कैसे हो सकता है? दिशा ने थकी हुई आवाज में कहा कि मैं अभी उसकी समस्या जानता भी नहीं हूँ। मैंने बीच की खाली जगह अपने अनुमान से भर दी थी।
हम दोनों काम करते थे। शादी के बाद घर के बहुत से काम मिलकर सँभालते थे और अपने संबंध को बराबरी वाला मानते थे। फिर भी बातचीत में मैं अक्सर सबसे पहले सलाह देने वाला बन जाता। दिशा किसी अनुभव का विवरण शुरू करती तो मैं उसके अगले वाक्य का अनुमान लगा लेता। मुझे अपनी तेजी उपयोगी लगती थी। उसे कभी कभी लगता था कि उसकी बात पूरी सुनने लायक नहीं समझी जा रही।
उस दिन कार्यालय में उसे डाँटा नहीं गया था। उसे एक बड़े काम की जिम्मेदारी मिली थी। कठिनाई यह थी कि वह खुश भी थी और डरी हुई भी। जिम्मेदारी के लिए कुछ दिनों तक दूसरे शहर जाना पड़ सकता था। वह मुझसे यह बात साझा करना चाहती थी कि अपने काम में आगे बढ़ते हुए घर की व्यवस्था कैसे करेंगे। मैं बिना सुने उसे किसी अन्य व्यक्ति से लड़ने का संदेश लिख रहा था।
अपनी भूल समझकर मुझे झेंप हुई। पहले मन हुआ कि कह दूँ, तुमने साफ क्यों नहीं बताया। फिर याद आया कि बताने का अवसर मैंने ही नहीं दिया था। मैंने उससे कहा कि वह शुरुआत से सुनाए। उसने पूछा कि क्या मैं इस बार बीच में नहीं बोलूँगा। यह प्रश्न सुनकर थोड़ी चोट लगी, लेकिन शायद मुझे वही असुविधा स्वीकार करनी थी जो मेरी आदत से उसे होती रही थी।
मैं उसके सामने बैठा। उसने बताया कि वह इस अवसर के लिए कई महीनों से काम कर रही थी। चुनाव होने पर उसे विश्वास नहीं हुआ। फिर यात्रा और घर की जिम्मेदारियाँ याद आईं तो उत्साह के साथ चिंता भी जुड़ गई। वह नहीं चाहती थी कि मेरी सहमति पाने के लिए अपनी खुशी छोटी करके बताए। उसे साथी चाहिए था, अनुमति देने वाला निरीक्षक नहीं।
इस बार मेरे पास तुरंत कहने को बहुत कुछ था, लेकिन मैंने पहले पूछा कि क्या मैंने ठीक समझा है। उसने कुछ बातें स्पष्ट कीं। मैं सोच रहा था कि वह केवल यात्रा की चिंता कर रही है। वह इस बात से भी परेशान थी कि अवसर स्वीकार करते ही लोग घर की व्यवस्था का प्रश्न केवल उसी से क्यों पूछते हैं। वह प्रश्न मेरे लिए नया था।
हमने उस रात कोई अंतिम निर्णय नहीं किया। दिशा ने अपनी खुशी खुलकर बताई। मैंने यात्रा की अवधि और अपने काम के समय के बारे में पूछा। फिर घर के काम लिखे। कुछ काम पहले से बाँटने थे और कुछ के लिए सहायता खोजनी थी। सूची बनने से सब आसान नहीं हुआ, लेकिन जिम्मेदारी अस्पष्ट चिंता से निकलकर साझा काम में बदलने लगी।
अगले दिन मैंने दिशा को अपना तैयार संदेश नहीं भेजा। उसकी जगह लिखा कि शाम को तुम्हारी प्रस्तुति का अभ्यास सुनना चाहूँगा, यदि तुम चाहो। उसने हाँ कहा। अभ्यास में भी मैंने पहले पूछा कि वह केवल सुनवाना चाहती है या सुझाव भी चाहिए। उसने दो बिंदुओं पर सुझाव माँगे और बाकी जगह ध्यान से सुनने को कहा। यह छोटी स्पष्टता दोनों के लिए उपयोगी रही।
कुछ सप्ताह बाद यात्रा हुई। घर में कई छोटी गलतियाँ हुईं। मैंने एक सामान गलत जगह रखा और समय की एक बात भूल गया। दिशा ने भी थकान में छोटा उत्तर दिया। फर्क यह था कि अब हम हर बात को संबंध की पूरी परीक्षा नहीं बनाते थे। जरूरत होने पर सीधे बताते और काम का तरीका बदलते। किसी की आवाज सुन लेना हर मतभेद समाप्त नहीं करता, लेकिन मतभेद का वास्तविक विषय सामने लाता है।
अब भी मेरी पुरानी आदत लौट आती है। किसी की बात आधी सुनकर मन में उत्तर बनना शुरू हो जाता है। तब दिशा कभी मुस्कराकर कहती है कि पहले अंतिम पंक्ति सुन लो। मैं रुक जाता हूँ। उस शाम मैंने मदद करना नहीं छोड़ा था। मैंने सहायता का पहला कदम बदला था। किसी प्रिय व्यक्ति को उत्तर देने से पहले उसके अनुभव को उसकी अपनी आवाज में पूरा होने देना भी साथ निभाने का काम है।