ऑनलाइन कक्षा में प्रश्न: समझ न आए तो पूछिए

ऑनलाइन कक्षा में शिक्षिका ने पूछा कि क्या सबको समझ में आ गया। स्क्रीन पर कई छोटे चेहरे चुप थे। समीरा ने उत्तर देने के लिए उँगली आगे बढ़ाई, फिर रोक ली। उसे तीसरा चरण समझ में नहीं आया था। वह पिछले कुछ वर्षों के बाद फिर पढ़ाई शुरू कर रही थी। साथ पढ़ने वाले कई विद्यार्थी उससे छोटे थे और उपकरणों का उपयोग उससे अधिक तेजी से करते थे।
समीरा घर से सिलाई का काम करती थी और शाम को लेखा रखने का छोटा पाठ्यक्रम सीख रही थी। उसे अपने काम का हिसाब बेहतर बनाना था। कक्षा में प्रवेश करना अब सीख गई थी, लेकिन प्रश्न पूछते समय लगता कि सबका समय रुक जाएगा। उसने सोचा कि रिकॉर्डिंग देखकर समझ लेगी। कक्षा समाप्त हुई और उसकी कॉपी में वही तीसरा चरण खाली रह गया।
अगले दिन अभ्यास करते समय चौथा और पाँचवाँ चरण भी उलझ गया। उसने रिकॉर्डिंग रोकी, पीछे की और फिर सुनी। आवाज साफ थी, लेकिन जिस कारण एक खाने की रकम दूसरी जगह जा रही थी, वह समझ में नहीं आ रहा था। बटन कहाँ दबाना है, यह दिख रहा था। निर्णय क्यों लिया जा रहा है, यह बात उसके हाथ से छूट गई थी।
तीसरी कक्षा में सहपाठी ऋत्विक ने लगभग वही प्रश्न पूछ लिया जिसे समीरा रोक रही थी। शिक्षिका ने कहा कि यह अच्छा प्रश्न है और पूरा उदाहरण फिर खोला। समीरा ने देखा कि केवल वह ही नहीं रुकी थी। कुछ दूसरे विद्यार्थियों ने भी सहमति लिखी। जिस बात को वह अपनी व्यक्तिगत कमी समझ रही थी, वह कई लोगों के लिए सीखने की असली बाधा थी।
विराम के समय उसने ऋत्विक को धन्यवाद लिखा। उसने जवाब दिया कि उसे भी पहले प्रश्न पूछने में झिझक होती थी। एक बार शिक्षक ने कहा था कि जहाँ कारण समझ में न आए, उस स्थान को पहचान लेना भी काम है। इसके बाद उसने अपनी कॉपी में अलग निशान लगाने शुरू किए। उत्तर का अनुमान भरने के बजाय प्रश्न को स्पष्ट करना अधिक उपयोगी निकला।
समीरा ने अगली कक्षा के लिए तीन प्रश्न लिखे। पहले प्रश्न में उसने पूरा अभ्यास नहीं, केवल वह वाक्य लिखा जहाँ भ्रम था। दूसरे में अपनी की हुई कोशिश दिखाई और तीसरा प्रश्न बाद के लिए रखा। जब शिक्षिका ने पूछा तो उसने हाथ उठाने का चिह्न दबाया। कुछ क्षण तक उसकी बारी नहीं आई। उसे लगा कि शायद गलती हुई है, फिर उसका नाम पुकारा गया।
उसने धीरे धीरे पूछा। बीच में आवाज अटक गई तो दोबारा बोली। शिक्षिका ने उदाहरण अपने शब्दों में समझाने को कहा। समीरा ने अपनी सिलाई की दुकान का हिसाब लिया। कपड़ा खरीदना, ग्राहक से अग्रिम राशि मिलना और तैयार कपड़े का बाकी भुगतान अलग समय पर होता था। अपने अनुभव से बात जोड़ते ही उसे समझ आया कि केवल रकम देखना पर्याप्त नहीं, उसका संदर्भ भी देखना है।
कक्षा में एक और विद्यार्थी ने उसी उदाहरण से प्रश्न किया। समीरा को आश्चर्य हुआ कि उसकी साधारण दुकान की बात किसी और के काम भी आ सकती है। वह केवल सहायता लेने वाली नहीं थी। अपने अनुभव से सीखने की प्रक्रिया में योगदान भी कर रही थी। उसकी आवाज बहुत तेज नहीं हुई, लेकिन उसे अपनी बात रखने की जगह थोड़ी अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगी।
शिक्षिका ने कक्षा के अंत में पूछा कि प्रश्न पूछने की व्यवस्था सबके लिए सुविधाजनक है या नहीं। कुछ लोग बोलना पसंद करते थे और कुछ लिखना। उन्होंने दोनों विकल्प रखे और अभ्यास के बाद छोटा प्रश्न समय भी दिया। इससे कक्षा धीमी नहीं पड़ी; जिन बिंदुओं पर बहुत लोग रुकते थे, वे जल्दी सामने आने लगे।
पाठ्यक्रम समाप्त होने तक समीरा हर बात तुरंत नहीं समझने लगी थी। कभी उसे दोबारा अभ्यास करना पड़ता और कभी मदद लेनी पड़ती। अंतर यह था कि अब वह खाली स्थान छिपाकर पूरी कॉपी दिखाने की कोशिश नहीं करती थी। जिस जगह नहीं समझा, उसे पहचानती और उसके बारे में पूछती। सीखने की गति की तुलना से अधिक ध्यान अपने काम की स्पष्टता पर आने लगा।
कुछ महीने बाद पड़ोस की एक महिला वही पाठ्यक्रम शुरू करना चाहती थी। उसने कहा कि इतने लोगों के सामने प्रश्न पूछना कठिन लगेगा। समीरा ने उसे यह भरोसा नहीं दिया कि सब आसान होगा। उसने अपनी पहली अधूरी कॉपी दिखाई। फिर कहा कि प्रश्न पूछने से हम पीछे नहीं रह जाते। कई बार उसी से आगे बढ़ने का रास्ता खुलता है, क्योंकि चुप रहने से बचा हुआ भ्रम अपने आप उत्तर में नहीं बदलता।