कालिदास का आरंभ: सुंदर शब्द तभी काम आते हैं जब अर्थ साथ हो

रघुवंश के मंगलाचरण से प्रेरित साहित्यिक चिंतन; आधुनिक कहानी काल्पनिक है
आरोही को विद्यालय के समारोह के लिए स्वागत संदेश लिखना था। उसने बहुत प्रभावशाली शब्द चुने। वाक्य लंबे थे, विशेषण चमक रहे थे और सुनने में भाषण भव्य लग रहा था। छोटे भाई ने पढ़कर पूछा कि कार्यक्रम कितने बजे है और उसमें करना क्या है। आरोही रुक गई। जो जानकारी सबसे पहले पहुँचनी चाहिए थी, वही शब्दों के बीच खो गई थी। उसे पहली बार लगा कि भाषा की सुंदरता केवल कठिन शब्दों की संख्या से नहीं बनती।
कालिदास के रघुवंश का पहला श्लोक वाणी और अर्थ के घनिष्ठ संबंध की सुंदर उपमा से आरंभ होता है। कवि पार्वती और परमेश्वर को प्रणाम करते हुए वाणी तथा अर्थ की प्रतिपत्ति की कामना करते हैं। यह मंगलाचरण अपने धार्मिक और काव्यात्मक संदर्भ में है। उससे प्रेरित होकर भाषा पर एक प्रश्न अवश्य पूछा जा सकता है: हमारे शब्द और हमारा आशय कितनी निकटता से साथ चल रहे हैं?
सजावट के पीछे छिपी बात
लिखते समय हम कभी पाठक की जरूरत से अधिक अपनी छवि पर ध्यान देने लगते हैं। हमें विद्वान, गंभीर या प्रभावशाली दिखना होता है। तब साधारण बात को भी इतना लपेट दिया जाता है कि पढ़ने वाले को अर्थ खोजने में अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है। कठिन विषय की अपनी कठिनाई हो सकती है, लेकिन अस्पष्ट लिखावट को ही गहराई मान लेना आवश्यक नहीं। स्पष्टता भी बौद्धिक परिश्रम का परिणाम है।
आरोही ने अपना संदेश दोबारा लिखा। पहले कार्यक्रम का उद्देश्य, फिर समय और उसके बाद सहभागिता का तरीका रखा। स्वागत का भाव बना रहा, लेकिन जानकारी अब साफ थी। उसने कुछ सुंदर वाक्य हटाए और कुछ सरल वाक्य जोड़े। उसे आश्चर्य हुआ कि संदेश छोटा होने पर भी अधिक आत्मीय लग रहा था। पाठक को जगह देने के लिए लेखक को कभी अपनी प्रिय सजावट कम करनी पड़ती है।
कविता और सूचना की अलग जरूरतें
इसका अर्थ यह नहीं कि हर लेखन केवल सीधी सूचना जैसा हो। कविता में ध्वनि, संकेत और अनेक अर्थों की सुंदरता होती है। कहानी में वातावरण बनाने के लिए ठहराव चाहिए। शास्त्रीय चर्चा में पारिभाषिक शब्द आवश्यक हो सकते हैं। भाषा की सफलता उसके प्रयोजन से भी जुड़ी है। सूचना पट्ट, प्रार्थना और शोध लेख की अभिव्यक्ति एक जैसी क्यों होनी चाहिए? प्रश्न सरल बनाम सुंदर का नहीं, उपयुक्त अभिव्यक्ति का है।
कालिदास की उपमा को भी केवल लेखन की आधुनिक सलाह में सीमित नहीं किया जा सकता। मूल श्लोक का अपना भक्तिपूर्ण और काव्यात्मक संसार है। यहाँ उससे प्रेरणा लेकर शब्द तथा अर्थ के संबंध पर लेखक का स्वतंत्र चिंतन प्रस्तुत है। मूल रचना का संदर्भ बचाते हुए समकालीन जीवन से संबंध बनाना साहित्य पढ़ने का एक विनम्र तरीका हो सकता है।
सुनने वाले तक पहुँचना
बातचीत में भी शब्द अकेले नहीं चलते। स्वर, अवसर और संबंध उनके अर्थ को प्रभावित करते हैं। सहायता देने के लिए कहा गया वाक्य यदि तिरस्कार से बोला जाए, तो सामने वाला उसे अपमान की तरह सुन सकता है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि मेरा इरादा अच्छा था। यह देखना भी आवश्यक है कि बात पहुँची कैसे। आशय और प्रभाव का अंतर संवाद को दोबारा सँभालने का अवसर देता है।
साथ ही हर गलतफहमी का दोष बोलने वाले पर ही डालना ठीक नहीं। सुनने वाले के अपने अनुमान भी काम करते हैं। इसलिए स्पष्ट प्रश्न उपयोगी हैं: आपका आशय यह था क्या? क्या मैं इसे सही समझा? ऐसी छोटी जाँच कई अनावश्यक विवाद रोक सकती है। संवाद में अर्थ दोनों ओर के ध्यान से खुलता है। शब्द भेज देना और बात समझ में आ जाना हमेशा एक ही क्षण की घटना नहीं होते।
भाषा का अभ्यास जीवन में
लेखन सुधारने का छोटा अभ्यास यह हो सकता है कि कोई परिचित व्यक्ति हमारा लिखा पढ़कर अपनी भाषा में उसका आशय बताए। यदि वह कुछ और समझे, तो हमें संशोधन की जगह दिखती है। यह परीक्षा में अंक देने जैसा काम नहीं, पाठक के अनुभव से सीखना है। कभी एक वाक्य का क्रम बदलना पर्याप्त होगा, कभी अस्पष्ट शब्द हटाना और कभी जरूरी पृष्ठभूमि जोड़ना पड़ेगा।
समारोह के दिन आरोही का संदेश पढ़ा गया। लोगों को जानकारी भी मिली और स्वागत का भाव भी महसूस हुआ। किसी ने कठिन शब्दों की प्रशंसा नहीं की, पर बहुत कम लोगों को समय पूछना पड़ा। उसे लगा कि उसकी भाषा ने आखिर अपना काम किया। कालिदास के मंगलाचरण से प्रेरित यह छोटी सीख हमारे साथ रह सकती है: शब्दों की सच्ची चमक तब बढ़ती है जब अर्थ उनसे अलग होकर भटकता न रहे।
संदर्भ और आगे पढ़ें
1. कालिदास, रघुवंश 1.1; मूल संस्कृत पाठ: GRETIL
https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/html/sa_kAlidAsa-raghuvaMza.htm
चित्र संबंधी सूचना: थंबनेल इस लेख के लिए बनाया गया कल्पनात्मक चित्रांकन है; इसे वास्तविक घटना का फोटोग्राफ या ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित चित्र न मानें।