कप का बदला हुआ कोण: रूपा ने अपनी रेखा देखनी शुरू की

रूपा की स्केचबुक के पहले पन्नों में छोटे घर, पत्तियाँ और चेहरों के अभ्यास थे। पिछले कुछ महीनों से वह एक लोकप्रिय कलाकार के चित्र देखकर रेखाएँ बनाती थी। उससे उसे आकार समझने और हाथ चलाने का अभ्यास मिला। फिर किसी ने उसके बनाए चित्र की तारीफ करते हुए कहा कि यह तो उस कलाकार जैसा लगता है। रूपा को अच्छा लगा, लेकिन साथ ही लगा कि यदि सामने वाला नाम हटा दिया जाए तो उसके अपने काम के बारे में क्या कहा जा सकेगा।
उसने अगली बार बिना किसी तस्वीर के एक कप बनाना चाहा। मेज पर रखा कप देखकर भी उसे पहले वाले कलाकार की रेखा याद आती रही। उसने वैसी ही घुमावदार छाया बनाई और वैसा ही किनारा। चित्र साफ था, पर उसे अपने सामने रखी वस्तु कम और याद किया हुआ तरीका अधिक लग रहा था। उसे लगा कि अब तक का अभ्यास शायद गलत रहा। उसने स्केचबुक बंद कर दी। अगले दिन कला कक्षा में शिक्षिका ने देखा तो पूछा कि रुकने का कारण क्या है।
रूपा ने कहा कि वह किसी की नकल किए बिना बना ही नहीं पा रही। शिक्षिका ने उसके पुराने पन्ने देखे। उन्होंने कहा कि अभ्यास से सीखी चीज को दुश्मन बनाने की जरूरत नहीं। उसे यह देखना होगा कि वह किस हिस्से को समझकर इस्तेमाल कर रही है और किसे केवल याद से दोहरा रही है। फिर उन्होंने मेज पर कप थोड़ा घुमा दिया। अब हैंडल का आकार बदला हुआ दिख रहा था। उन्होंने रूपा से कहा कि नाम और शैली की बात कुछ देर छोड़कर केवल सामने दिख रही दो खाली जगहों को देखे।
रूपा ने कप के भीतर और हैंडल के पास की जगह को देखा। पहली बार उसे लगा कि साधारण वस्तु भी हर कोण से एक जैसी नहीं दिखती। उसने धीमी रेखाएँ बनाईं। कुछ टेढ़ी थीं, कुछ बीच में मिटानी पड़ीं। पन्ना पहले वाले चित्र जितना आकर्षक नहीं लग रहा था, लेकिन वह अपने देखने से बन रहा था। शिक्षिका ने उसकी तुलना किसी प्रसिद्ध कलाकार से नहीं की। उन्होंने पूछा कि अभी कौन सा आकार सचमुच देखा और कौन सा अनुमान से भर दिया।
अगले सप्ताह रूपा ने अपने कमरे की तीन वस्तुएँ चुनीं। एक पुरानी चप्पल, खिड़की का कुंडा और मुड़ा हुआ कागज। ये चीजें उसके पसंदीदा कलाकार की तस्वीरों में नहीं थीं। वह उन्हें अलग अलग दिशा से बनाती रही। कभी पन्ने का बड़ा हिस्सा खाली रह जाता, कभी रेखा बहुत दब जाती। उसने हर पन्ने को साझा करने लायक बनाने की शर्त नहीं रखी। कुछ अभ्यास केवल देखने की आदत बदलने के लिए थे। अपनी रेखा खोजने का अर्थ हर बार अनोखा परिणाम देना नहीं निकला।
एक दिन मित्र ने उसके खिड़की वाले चित्र को देखकर कहा कि यह उसके कमरे जैसा लगता है। रूपा ने हँसकर कहा कि सचमुच वही है। इस प्रतिक्रिया में कोई बड़ा पुरस्कार नहीं था, लेकिन उसे अपना अनुभव पहचान में आता सुनाई दिया। उसने पुराने अभ्यास वाले चित्रों को फाड़ा नहीं। जहाँ किसी कलाकार के काम से सीधा अभ्यास किया था, वहाँ निजी नोट में वह संदर्भ स्पष्ट रखा। अपने स्वतंत्र चित्रों को दिखाते समय उसने उन अभ्यास प्रतियों को मौलिक काम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।
कुछ महीनों बाद स्केचबुक के पन्ने पलटते समय उसे कोई एक निश्चित शैली नहीं मिली। अलग दिनों की अलग रेखाएँ थीं। कहीं पुराने प्रभाव साफ थे, कहीं उसका अपना देखना अधिक मजबूत था। अब उसे इस मिश्रण से उतनी बेचैनी नहीं हुई। उसने समझा कि अपनी आवाज शायद किसी सुबह अचानक प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं। वह सीखने, पहचानने, ईमानदारी से संदर्भ मानने और सामने की दुनिया को फिर देखने के बीच बनती रहती है। उसने पेंसिल उठाई और खिड़की पर पड़ा एक नया पत्ता बनाने लगी। इस बार उसे केवल इतना करना था कि उसे सचमुच देखे।