दस लोगों के सामने एक कविता: नायरा की डायरी से बाहर आई आवाज

पठन गोष्ठी के निमंत्रण पर नायरा ने अपना नाम तो लिख दिया था, लेकिन कविता चुनते समय हर पन्ना उसे बहुत निजी लगने लगा। उसकी डायरी में वर्षों से छोटी कविताएँ थीं। उन्हें लिखना आसान था, क्योंकि कमरे में कोई सुनने वाला नहीं होता था। अब दस लोगों के सामने अपनी ही पंक्तियाँ पढ़ने का विचार आते ही शब्दों का अर्थ बदल गया। उसने सोचा कि किसी प्रसिद्ध कवि की रचना पढ़ दे। इससे कार्यक्रम में भाग भी हो जाएगा और अपने लिखे पर किसी की प्रतिक्रिया भी नहीं सुननी पड़ेगी।
उसने गोष्ठी की संयोजिका से पूछा कि क्या अपनी कविता पढ़ना अनिवार्य है। उत्तर आया कि बिल्कुल नहीं, जो सहज लगे वह पढ़े। नायरा को राहत मिली, मगर साथ ही यह लगा कि उसने अवसर मिलने से पहले ही अपना रास्ता बंद कर दिया है। वह अपनी कविता साझा करना चाहती थी। उसे केवल यह तय करना था कि कितना साझा करना उचित लगेगा। डायरी का हर पन्ना मंच के लिए नहीं था। निजी अनुभव को निजी रखने का अधिकार उसके पास अभी भी था।
उसने घर की खिड़की और दोपहर की धूप पर लिखी एक छोटी कविता चुनी। उसमें किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान या निजी बातचीत नहीं थी। कविता को जोर से पढ़ा तो कुछ शब्द उसके अपने ही कानों को कठिन लगे। लिखते समय जो पंक्ति सुंदर दिखाई देती थी, बोलते समय साँस के बीच टूट रही थी। उसने उसे दो हिस्सों में बाँटा और एक अनावश्यक विशेषण हटा दिया। यह संपादन दूसरों को प्रभावित करने से पहले अपनी कविता को सुन सकने का छोटा अभ्यास बन गया।
अगले दिन मित्र रोहन के सामने पढ़ने बैठी तो शुरुआत में हँस पड़ी। रोहन ने कहा कि चाहे तो वह दूसरी ओर देखकर सुनेगा। नायरा ने हामी भरी। उसने पूरी कविता पढ़ी और तुरंत पूछा कि खराब तो नहीं है। रोहन ने कहा कि पहले यह बताए कि वह किस तरह की प्रतिक्रिया चाहती है। नायरा कुछ देर सोचती रही। फिर बोली कि क्या खिड़की वाला दृश्य साफ आया और कहाँ पढ़ने में जल्दी लगी। इन दो प्रश्नों पर उसे ऐसा उत्तर मिला, जिसका उपयोग वह कर सकती थी।
गोष्ठी वाले दिन उसने डायरी के साथ एक अलग कागज भी रखा। नाम बुलाया गया तो हाथ थोड़ा काँपा। उसने श्रोताओं को अपने डर का लंबा परिचय देने के बजाय कविता का छोटा शीर्षक बताया और पढ़ना शुरू किया। बीच में एक शब्द दो बार आया। उसने रुककर सही पंक्ति पढ़ी और आगे बढ़ गई। कविता समाप्त हुई तो कुछ सेकंड की चुप्पी रही। पहले उसे लगा कि लोगों को पसंद नहीं आई। फिर एक श्रोता ने धूप के दृश्य के बारे में बात की। लोग शब्द सुनकर सोच भी सकते थे; हर विराम अस्वीकृति नहीं था।
प्रतिक्रिया में एक व्यक्ति को अंतिम पंक्ति अस्पष्ट लगी। नायरा का पहला मन हुआ कि पूरी कहानी समझाकर उसे स्पष्ट कर दे। फिर उसने पूछा कि उन्हें किस शब्द पर उलझन हुई। बात एक शब्द तक सीमित निकली। उसने नोट किया। दूसरे श्रोता ने वही पंक्ति अलग तरह से समझी थी। नायरा ने देखा कि अपनी रचना साझा करने के बाद हर अर्थ पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं रहता। फिर भी वह सुन सकती है, प्रश्न पूछ सकती है और हर सुझाव को तुरंत मानने या ठुकराने की बाध्यता से बच सकती है।
घर लौटकर उसने कविता को फिर पढ़ा। एक शब्द बदला, बाकी पंक्तियाँ रखीं। गोष्ठी में मिली तालियाँ अच्छी लगी थीं, लेकिन उससे अधिक उसे यह याद रहा कि उसने अपना चुना हुआ काम अपनी आवाज में पूरा पढ़ा था। डायरी के अगले पन्ने अभी भी निजी थे। उसे सब कुछ सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं थी। अगले महीने वह फिर जाएगी या नहीं, यह बाद में तय होगा। फिलहाल खिड़की के पास बैठकर एक नई पंक्ति लिखना पहले से थोड़ा सहज लग रहा था। उसे सुनाने का निर्णय भी अब पूरी तरह डर के हाथ में नहीं था।