मंच से उतरे गमले कहाँ गए: अद्विका ने वापसी की सूची जोड़ी

मंच के दोनों ओर लगाए गमले तस्वीर में बहुत सुंदर लग रहे थे। कबीर ने रोशनी की जाँच की और आयोजक को कहा कि इस बार पृष्ठभूमि में सच्ची हरियाली आएगी। कार्यक्रम समाप्त हुआ तो सामान उठाने वाले लोग गमलों को पीछे के बंद कमरे में रखने लगे। डिजाइनर अद्विका ने पूछा कि पौधे वहीं क्यों जा रहे हैं। उत्तर मिला कि अगले कार्यक्रम तक सामान इसी कमरे में रहता है। तीस वर्ष की अद्विका ने पहली बार अपनी सूची देखी। उसने गमले आने का समय लिखा था, लौटने और बाद की देखभाल का कोई स्पष्ट नाम नहीं था।
उसने पौधे उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति को फोन किया। उन्होंने बताया कि ये गमले अगले दिन वापस जाने हैं और बीच के समय में उनकी स्थिति का ध्यान रखना होगा। अद्विका को लगा कि मंच पर इन्हें रखने तक ही वह अपना काम पूरा मान रही थी। कपड़े, स्टैंड और जीवित पौधों को एक जैसी सजावट की वस्तु समझ लिया गया था। उसने संबंधित व्यक्ति से उचित व्यवस्था पूछी और टीम को बताया कि किस सामान को कहाँ रखना है। अपने अनुमान से पौधों पर कोई उपचार नहीं किया। पहले जिस काम को केवल समेटना समझा जा रहा था, उसमें देखभाल और सुरक्षित वापसी भी जुड़ गई।
अगली सुबह गमले लौटे तो एक का बाहरी हिस्सा टूट गया था। टीम में पहले यह खोज शुरू हुई कि किसने उठाया था। अद्विका ने नुकसान की जानकारी सही व्यक्ति को दी, फिर पूरा क्रम देखा। गाड़ी के स्थान तक पहुँचाने की जिम्मेदारी अलग लोगों में अस्पष्ट थी। रास्ते में अन्य सामान भी रखा था। केवल अंतिम हाथ पर दोष डालने से अगली बार वही स्थिति रह जाती। उन्होंने वापसी का समय, रास्ता और संभालने वाले लोगों का क्रम स्पष्ट किया। नुकसान का समाधान संबंधित लोगों से तय हुआ और उसकी बात सूची में दर्ज हुई।
कुछ सप्ताह बाद नए कार्यक्रम का प्रस्ताव आया। आयोजक को और अधिक पौधे चाहिए थे। अद्विका ने पहले पूछा कि स्थान, समय और देखभाल की सुविधा क्या है। केवल हरियाली अधिक दिखाने की इच्छा से वस्तुएँ जोड़ने के बजाय उपयुक्त संख्या और तरीके पर जानकार की सलाह ली गई। कुछ जगह कपड़े की सरल पृष्ठभूमि रखी गई और जहाँ पौधों की सही व्यवस्था बन सकती थी, वहीं उनका उपयोग हुआ। इससे मंच कम भरा हुआ लगा, लेकिन अद्विका को काम अधिक साफ लगा। डिजाइन का अच्छा विचार उसकी पूरी अवधि की जिम्मेदारी के साथ बन रहा था।
कबीर ने नई तस्वीर देखते हुए पूछा कि पिछली बार जैसी घनी सजावट क्यों नहीं है। अद्विका ने उसे वापसी की सूची दिखाई। कबीर को पहले लगा कि तस्वीर के काम में ये बातें बहुत पीछे की हैं। फिर उसने कहा कि अगले शूट में सेट खाली करने का समय भी योजना में जोड़ सकता है। कैमरे के सामने दिखने वाला दृश्य कुछ घंटों का था, लेकिन उसके लिए लाई चीजों का जीवन उससे लंबा था। दोनों ने अपने काम की सीमा को केवल तस्वीर बन जाने वाले क्षण तक रखने की आदत पहचानी।
कार्यक्रम वाले दिन कुछ मेहमान पौधे के साथ फोटो लेने लगे। एक व्यक्ति पत्तियों को अपनी ओर मोड़कर जगह बना रहा था। अद्विका ने विनम्रता से गमले का स्थान थोड़ा बदलवाया ताकि रास्ता और तस्वीर दोनों सहज हों। वह हर मेहमान की निगरानी नहीं कर रही थी। उसने डिजाइन में वही सुविधा पहले सोचने की कोशिश की जिससे सामान्य उपयोग में चीजों को बार बार खींचना न पड़े। टीम के लिए भी यह आसान हुआ। सुंदरता को संभालकर रखने का काम केवल किसी एक सतर्क व्यक्ति की लगातार मौजूदगी पर निर्भर नहीं रहा।
अंतिम तस्वीर भेजने के बाद अद्विका उस दिन भी कुछ देर रुकी। गमलों के नाम सही संख्या से मिलाए गए, वापसी की व्यवस्था पूरी हुई और जगह अपने सामान्य उपयोग के लिए खुली। उसने सूची पर आखिरी निशान लगाया। मंच खाली था, फिर भी उसे अपना काम अधूरा नहीं लगा। पहले हरियाली उसके डिजाइन में रंग और आकार की तरह आती थी। अब उसके साथ समय, जरूरत और देखभाल का विचार भी था। तस्वीर सुंदर बनी थी, लेकिन अद्विका को सबसे अधिक संतोष उस सुबह मिला जब पौधे सही जगह लौट चुके थे और अगला आयोजन आने तक किसी बंद कमरे में भूले नहीं गए थे।